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Monday, September 20, 2010

बहुत याद आते हैं...









              यकीं  नहीं   आता ..कि कॉलेज छोड़े हुए....२२ साल बीत चुके.हैं  
.......२२ साल सोचो तो कितना बड़ा अरसा है....पर महसूस करो तो लगता 
है .............अरे अभी कल की  ही तो बात है.....जब हमने कॉलेज ज्वाइन किया था.....और वहां १० साल बिताए थे.....वो १० साल बिताने   के   बाद   भी   २२ साल बीत चुके हैं............यानि लगभग ३१ साल से फाइन आर्ट्स हमारा है.....हमारे दिल के बहुत करीब...........कितनी तमन्ना और प्यार के साथ वहां ज्वाइन किया था हमने......और उतने ही प्यार और उम्मीदों  के साथ  वहां से विदा  भी ली  थी ................हमारा सौभाग्य  है कि  आज  भी हमारा वहां आना जाना होता रहता है......जब भी कुछ लम्बे समय के लिए बनारस जाना हुआ है कॉलेज जरूर गए हैं हम लोग.....अब तो काफी लोग जा चुके हैं वहां से या  .........यूं कहूं  कि बहुत कम लोग ऐसे  हैं वहां अब....... ..................जो हमारे परिचित हैं..........पर जो भी हैं आज भी उतने ही प्यार और  ख़ुलूस से मिलते हैं ....ये बहुत  अच्छा लगता है.....
        
         ज्यादातर प्रोफेसर्स  तो अवकाश ग्रहण कर चुके हैं........या अब हमारे बीच नहीं रहे हैं........पर अभी भी वहां जाकर....उन सभी के होने का आभास होता है...................उनके चेम्बर्स  या क्लास अभी भी उनकी याद दिलाते हैं..........अब उन चेम्बर्स में हमारे पुराने सीनीअर्स जो अब वहां लेक्चरर्स और प्रोफेसर्स  बन चुके हैं .......बैठते हैं.......पर उनको देख कर वो फीलिंग्स नहीं आतीं......एक सूनापन सा लगता है.....बरबस ही वे सारे चेहरे आँखों के सामने घूम जाते हैं.......

          सारे  कॉलेज में घूम घूम कर सभी पुरानी बातो को याद करना बहुत अच्छा लगता है..............वैसे  अब कॉलेज की  पुरानी इमारत में काफी कुछ बदलाव आगया है.........................फिर भी बहुत कुछ वैसा  का वैसा  ही है ...........वो सीढियां जहाँ सबसे पहली बार कॉलेज जाने के    बाद हम सब बैठे थे.........और हमेशा बैठा करते थे.......आज भी सारे छात्र वहीँ बैठे मिलते हैं.........सब कुछ वैसा  ही है बस बैठने वाले बदल गए हैं.........बाहर के कोरिडोर में जगन्नाथ केसरवानी  सर की बनाई  हुई ....गंगा पूजन को जाती हुई दुल्हन  और दूल्हा ..............बेहद सजीव और सुन्दर चित्र है .................वो कॉमन रूम जहाँ बार बार जाकर शीशा देखा जाता था.....वो गेलरी जहाँ से दोनों तरफ के लान  जिनमे सुन्दर गुलाब के फूल लगे हुए थे   .........और जो कॉलेज के आखिरी सिरे पर जा के ख़तम होती थी.......बीच में बहुत बड़ी लाइब्रेरी    .........वो बोहरा सर का फोटोग्राफी रूम ......वो पेंटिंग का ग्राफिकस  और म्यूरल  पेंटिंग वाला कमरा..............जिनके ऊपर एसबेसडस   शीट  की  छतें थी..............जो गर्मी के मौसम में तो पूरा आग उगलती थीं.........उन कमरों में बैठना बड़ा ही तपस्या करने जैसा काम था...................पर बनर्जी सर वहां बैठे मिलते थे..........वहां हमने लीनो कट और ग्राफिक डिजाईन बनाना सीखा........लीनो कट में एक सॉफ्ट रबर की  शीट जिसपर पतले पतले महीन टूल्स से उभार कर चित्र बनाया जाता था ....और रोलर से इंक लगाने के बाद उसे सफ़ेद कागज़ पर छापा जाता था.....जितना हिस्सा  कटा होता था उसे छोड़ कर बाक़ी जिस हिस्से पर इंक लगी होती थी .....वो बड़े ही सुन्दर ढंग से चित्र के रूप में छप जाता था............बड़ा ही अच्छा अनुभव है ये भी.......
        ग्राफिक  रूम के सामने ही टेक्सटाइल रूम था जहाँ श्री जयशंकर सर और गोकुल सर बैठा करते थे........जयशंकर सर ...........बेहद हंसमुख और मिलनसार थे............बड़ी बड़ी ऐंठी हुई मूंछें   और धोती कुरता    ...हर समय बनारसी पान  से  भरा हुआ   मुंह ...........उनका  टेक्सटाइल का काम बहुत अच्छा था.......गोकुल सर  ट्रेडिशनल काम के माहिर थे ....  और बहुत महीन  डिजाइन बनाते थे ........उनके बोलने का लहजा थोडा ग्रामीण था जिस से   ...जो बच्चे खुद को जरा ज्यादा पढ़ा लिखा या अंग्रेजी बोलने वाला समझते थे वो उनका कभी कभी मजाक भी बना देते थे.......जिसके लिए मुझे शर्मिंदगी है.......वहां एक जगन्नाथ केसरवानी  सर भी थे.............जो बहुत अच्छे चित्रकार थे खास कर ट्रेडिशनल पेंटिंग्स में ...........वो रंग स्वयं बनाते थे............और    ऐसे ही कभी अपने प्रयोग करते समय किसी केमिकल रिएक्शन के कारण अपने आँखें गँवा बैठे थे..........ये सब हम लोगो के एडमिशन  के पहले की बात है.............क्यों कि हमने उनको नेत्रविहीनता के साथ ही देखा..और किस्सा ही सुना था ....वे रिक्शा से कोलेज आते थे और उनको टेक्सटाइल डिपार्टमेंट तक ले जाने के लिए कोई न कोई सहारा देता था..............कुछ एक बार मैं भी ले कर गई हूँ.......वे बाद में सिर्फ थ्योरी की  क्लास लेने लगे थे......
            टेक्सटाइल रूम में एक हथकरघा मशीन भी रखी हुई थी जिस पर कपडा बुनना सिखाया जाता था........टेक्सटाइल और ग्राफिक रूम से बाहर आने के बाद ......  ........ वुड कार्विंग का कमरा था...........जहाँ सबसे पहले लकड़ी की  मूर्ति बनाने का काम सीखा था........छेनी और लकड़ी की  हथौड़ी से..(मैंने काठ का उल्लू बनाया था)..................
        और वुड कार्विंग रूम के ठीक पीछे..........सेरेमिक्स या पोट्री मेकिंग की  क्लास थी.......जहाँ बर्तन बनाने  सिखाये जाते थे...... बहुत बढ़िया चिकनी मिटटी से पतले पतले क्वायेल  बना कर एक पर एक चिपकाते हुए....ऊँचे ऊँचे लम्बी गर्दन वाले फ्लावर पाट  और ............छोटे छोटे चाक चला कर सुन्दर सुन्दर आकार  वाले छोटे  छोटे  घड़े या मग  या कप बनवाये जाते थे................बहुत मन लगता था इसमें ....पर मुझे बहुत  दुःख है कि मैं कभी भी एक जैसे  क्वायेल नहीं बना सकी   .......और उस वजह से मेरे पाट  कभी भी बहुत अच्छे नहीं बन पाए.....मेरी   सहेली  अनामिका  बहुत अच्छे क्वायेल बना लेती  थी.................और उसने  अच्छे अच्छे बर्तन भी बनाये  थे............उन बर्तनों   को सुखा  कर उन पर अपने  मन से सुन्दर डिजाइन     बना कर रखा  जाता था .....फिर उन्हें  आंच  पर पकाया  जाता था...और ......जब वे भठ्ठी से बाहर निकाले  जाते थे तब उनकी चमक और खूबसूरती देखते ही बनती थी..........पहली बार जब हम लोगो ने  ये सब देखा तो बड़े ही प्रभावित हो गए थे................क्योकि तब तक ऐसे बर्तन सिर्फ बाज़ार में दुकानों में ही देखे थे....जब ये लगा कि ये सब अपने हाथ से किया जा सकता है तो बड़ी ख़ुशी हुई थी.........घर पर बहुत दिनों तक वैसे बर्तन सजा कर रखे थे.....आज पता नहीं कहाँ हैं वो.....
        
               पोट्री  डिपार्टमेंट के बाद ही मूर्तिकला विभाग था .... वहां उस समय....ठाकुर दिनेश प्रताप सिंह हेड थे.............जो ठाकुर साहब  या सिंह  साहब ही कहलाते थे.......जब हम लोगो ने उनका नाम सुना था तो ये लगा था कि कोई बहुत  भारी  भरकम शानदार व्यक्तित्व होगा......पर जब उन्हें देखा तो........बहुत   ही दुबले पतले छोटे कद के.....पर उनका पहनावा और दोनों तरफ को मुड़ी हुई बड़ी बड़ी नुकीली मूंछें  उनके राजपूत होने का आभास कराती थीं...........ठाकुर साहब सीने पर बाएँ ओर दो लम्बी लम्बी डोरियों से बंधा हुआ  मुग़ल कालीन अंगरखा और चूड़ीदार  पाजामा....और आगे से मुड़ी हुई नोकदार नागरा जूतियाँ  पहनते थे ....और होंठो में सिगार रहता था......(सर से क्षमा याचना के साथ).....हमने जब उनको पहली  बार देखा तो यही लगा था कि किसी नाटक में उनको राजपूत का रोल दिया गया है और वे उसका अभ्यास कर रहे हैं............पर बाद में रोज रोज उन्हें देखते देखते ये अहसास  हो गया था..कि सर शायद पैंट  शर्ट में उतने अच्छे नहीं लगते...जितना इस तरह लगते थे......बहुत स्नेह शील थे वो हम सभी के साथ.....................हमारी मूर्ति कला की क्लास के पहले अध्यापक  वही थे............उनका काम इतना अच्छा था कि मैंने उतना अच्छा ट्रेडिशनल .... काम किसी और का फिर कभी नहीं देखा........बड़ी बड़ी मूर्तियाँ जो सर ने बनाई थीं आज भी वहां रखीं. हैं.........
       
      .......ज्वाइन करने के थोड़े दिनों बाद हमारी मूर्ति कला कि क्लासेज  मिसेज.लतिका कट लेने लगीं....वे आज कल जामिया मिलिया (दिल्ली ) में फाइन  आर्ट्स कि हेड हैं............छोटे से कद की     खूब गोरी  और  बहुत एक्टिव .... ...बहुत अच्छी कलाकार.....मुझे याद है उनके बाल बहुत ज्यादा लम्बे थे......और वे उनको लपेट कर जूड़ा सा बना लेती थीं....खादी  का मरदाना कुरता और जींस पहनती थी वे ...........उनके पति श्री बलबीर कट थे जो खुद भी भारत के विख्यात मूर्तिकारो में गिने जाते हैं.............ये ऐसे  कलाकार लोग हैं जिनका ज़िक्र  हमने सिर्फ किताबों में ही पढ़ा था.....पर जब उनसे रूबरू हुए ..और उनको नज़दीक से जाना तब महसूस हुआ कि कितने सरल और मित्रवत थे वो लोग........कॉलेज टूर में कट सर की गायी   हुई ...बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल......लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में......आज भी यादो में तरोताजा है.......कट सर गाते वक़्त अपना गला पकड़ के गाते थे...ये उनका कुछ अपना अंदाज़ था...वो ऐसा  क्यों करते थे नहीं मालूम......पर जो भी हो    बहुत अच्छा लगता था उनके मुंह  से.....हम लोगो ने कई बार वो ग़ज़ल उनसे सुनी थी.......


.       वहां जाने के बाद  सब कुछ फिर से जीवंत हो उठता है...... ..स्कल्पचर डिपार्टमेंट में राम गरीब जी थे और पोट्री डिपार्टमेंट में पांचू दादा ....  जो मिटटी छान कर थोडा थोडा पानी मिला कर उसे चिकना  करते थे और पैरों से मल  कर ....मुलायम कर के मूर्ति बनाने   लायक बनाते थे.....फिर सबको  एक एक ढेर  या लोंदा   जो भी कहें        .....  देते  थे............  सभी बच्चो को एक एक लम्बी टांगो वाले स्टूल दिए जाते थे जिनपर वो मिटटी रख कर मूर्ति बनाना सीखते  थे ...................ये ऐसे स्टूल थे जिनके चारो        तरफ घूम घूम के काम किया जा सकता था........पोट्री के लिए इस तरह के स्टूलो पर चाक  बनी हुई थी ................जिसे घुमा घुमा कर पाट बनाते थे....मुझे याद है ..............हम को सबसे पहली बार नाक  (नोज ) बनाने को दी  गई      थी..........एक पहले से बनी हुई नाक  के आकार की  मूर्ति थी जिसे   देख     के हम लोगो को बनाना  था.....और सभी लोगो ने ...ऐसा  ऐसा     आकार बनाया था जो पता     नहीं क्या क्या लग रहा था..सिर्फ नाक नहीं लग रहा था...........उसके    बाद आँख...   .. होंठ   ....पूरा    चेहरा   ........हाथ  पैर   ......बनाना    सिखाया    गया.........फिर छोटी     छोटी    मूर्तियाँ   ..जिन्हें    मेकेड   कहते  हैं..बनाना   बताया   गया...पर मुझे मूर्ति कला में ज्यादा   दिलचस्पी   नहीं रही  ................क्योकि ये काम बहुत शारीरिक   मेहनत    मांगता   था.....और धूल   मिटटी से भरा था.....मूर्तिकला विभाग  में जाने का मतलब  था....सारे कपड़ो  में मिट्टी    और गन्दगी  लग जाना.......पर कुछ लडको  को बहुत रूचि  थी.......जिनमे  ज्ञान  सिंह प्रमुख  था.....आज ज्ञान  सिंह ने मूर्तिकला   में काफी नाम कर लिया  है.........देश   के अग्रणी  कलाकारों  में नाम है उसका.......उसने और बिश्राम    प्रसाद   यादव     ने  वुड कार्विंग   में पहली बार . खरगोश  बनाया था ................मुझे आज भी याद है..............हम सभी  लोग साथ में ही काम करते थे........................और ज्ञानसिंह  मेरी बहुत   मदद    कर देता  था..............मेरी बनाई  हुई कुछ छोटी  छोटी     गणेश    की  मूर्तियों    को उसने मेटल   में कास्ट  भी किया था................पर  अफ़सोस    है कि वो मूर्तिया   मुझे कभी वापस    नहीं मिली  ......मूर्ति कला में भी सुरेखा   का काम बहुत सुन्दर था.....वो बहुत ही नाज़ुक   सी   और खूबसूरत   सी   मूर्तिया  बनाती    थी......यहाँ   तक कि उसने चाक जैसे   सॉफ्ट   पदार्थ   पर भी आलपिन   से मूर्तिया   बना डाली थीं ......सभी हैरान रह  जाते थे उसका काम देख कर  ........बिश्राम     को फोटोग्राफी     में बहुत रूचि   थी और उस  ने  फोटो  स्टूडियो    खोल     लिया    था और आज भी वो अपना  स्टूडियो    चला रहा है.........
.        हमारे फोटोग्राफी के सर थे श्री डी.एल.वोहरा....जो कि हिन्दुस्तान के जानेमाने  फोटोग्राफर्स में से एक रहे हैं.......बेहद अच्छे  थे वो पर बच्चे उन्हें बहुत तंग करते थे.....जिसकी वजह उनका थोडा मूडी होना भी था.......बड़ी जल्दी किसी बात पर नाराज़ हो जाना .......और अपनी टेबल की  चीजो को हर समय संभालते रहना उनका स्वभाव था................या कोई फोबिया था ..................नहीं कह सकती ....हम लोगो का पूरा ध्यान उनके लेक्चर  से  ज्यादा उनके टेबल पर रहता था ..........जहाँ वो बड़े ही मनोयोग से अपना सामान संभालते रहते थे...........पर वो ........जितनी बार अपना सामान   संभालते.....लड़के उनकी नज़र बचाकर फिर इधर उधर कर देते......वे फिर ठीक करते और लड़के फिर वही काम करते...इसे देखते देखते... ..बड़ी हंसी आती थी........पर सब नजरे बचा कर खीं खीं करते रहते.........और मज़ा तो तब आता जब हम सभी उनके साथ ...प्रिंट डेवलप करने उनके डार्करूम में जाते थे............. 
                  अपनी खींची   हुई  फोटोज  का  प्रिंट  बनाने  जब  हम  पहली  बार  डार्क  रूम  में  गए  और  नेगेटिव  से पोजिटिव   बनाया  .......उफ्फ्फ .....कितना   अद्भुत  लगा  था  जैसे  कोई  चमत्कार  हो .....फोटोपेपर  को  चार  तरह  के  केमिकल्स  ........जिनमे   डेवेलपर  हाइपो  और  एक  क्या  था  याद  नहीं  आरहा ..में से  गुजरना  पड़ता  था ...और  जब  धीरे  धीरे  उस  पर  आकार  उभर  आता  था  तो  एक  जादू  देखने  जैसा  अनुभव  होता   था  वो ......सबका  पूरा  ध्यान  रहता  था  की  .......किसकी  फोटो  सबसे  अच्छी  आई  है ......उस  समय  के  बनाये  हुए  वो  प्रिंट्स  आज  भी  एक  धरोहर  की  तरह  हैं ......बहुत  सी  फोटोज  खींची  हैं  हम  लोगो  ने ........अब तो यही लगता है की ब्लेक  एंड व्हाईट फोटोज का कोई जबाब नहीं.....
       एक दम अँधेरा कमरा ...सिर्फ एक लाल बल्ब जलता रहता था.....छोटे से कमरे में ....सभी एक दूसरे से सट  कर खड़े होते थे..............हम चारो लडकियां  बोहरा सर की   बाएँ तरफ लडको से अलग हट कर खडी होती थीं.........वहां बड़ा सा पंखा चलता रहता था.........एक दिन किसी लड़के ने किसी लड़के को चुटकी काट ली फिर तो चुटकी का आदान प्रदान होने लगा और फिर किसी ने सर को ही चुटकी काट ली.......कितना जोर से बिगड़े थे सर आज भी याद है.......क्या बदतमीजी है...............बाहर  निकलने के बाद कोई सर से बात नहीं कर पा रहा   था   ...........इतनी शर्म आई थी.......
      बहुत  दिनों बाद सर से मिलने उनके घर गई थी.....बहुत  अशक्त और वृध्द हो गए थे सर........ .....बहुत रोना आया उनसे मिल के......अब नहीं है वोहरा सर....पर उनकी जगह आज तक कोई नहीं ले पाया......फाइन आर्ट्स में................फोटोग्राफी सेक्शन की  जगह भी काफी बदल गई है........फोटो ग्राफी     रूम के सामने ही टायपोग्राफी  सेक्शन था  ......वहां श्रीवास्तव सर थे...................और उनके हेल्पर  थे संपत जी.....बहुत ज्यादा ख्याल रखने वाले...... वे बच्चो की  कितनी मदद करते थे आज सोचती  हूँ तो मन  भर  आता  है......इतना  स्नेह ................इतनी  लगन  से कोई चीज  सिखाना .......आज भी फाइन आर्ट्स जाती  हूँ तो ....संपत जी  ,लाल  जी,गोपाल जी सभी से मुलाकात होती है...कुछ लोग तो अब रिटायर हो गए हैं.....पर अभी भी जो लोग मिलते हैं बहुत प्रेम से से मिलते हैं............ टायपोग्राफी  में प्रेस का काम सिखाया जाता था....कोई भी मैटर कैसे  कैसे टाइप किये जाते हैं उनको मशीन से कैसे  छापा जाता है..लेटर पैड  बनाना...कैलेण्डर बनाना.....ग्रीटिंग कार्ड बनाना   ये सब वहां पर सीखा  ...............बहुत ही इंट्रेस्टिंग विषय था वो भी.....एक बार मेरे एक साथ के छात्र गिरीश का हाथ प्रेस मशीन में दब गया था....उसकी ३ उंगलियाँ  कड़कडा कर टूटते हुए मैंने देखीं......पूरी मशीन और फर्श खून से भर गई थी.......आज भी याद कर के सिहर उठती हूँ.......टायपोग्राफी सेक्शन  का ही एक और हिस्सा था ब्लाक  मेकिंग.....जहाँ ब्लाक  बनाना बताया जाता था..................ये चूंकि  मेरी दिलचस्पी का विषय नहीं था............इस लिए इसमें मैंने ज्यादा काम नहीं किया.....या यूं  कहूं  कि मेरे ज्यादातर ब्लाक्स यादव जी (ब्लाक मेकिंग  के हेल्पर) ने ही बना दिए थे.....मुखर्जी सर से क्षमा  याचना सहित ........



.     खैर   ......पहला    और दूसरा    साल इसी    तरह बीत गया.......तीसरे    साल से कोई एक विषय   लेना   होता था जिसमे     ज्यादा    रूचि     होती     थी...तो मैंने और सुरेखा  ने अप्लाइड   आर्ट्स (कोमर्शिअल  आर्ट्स )चुना  और राजश्री और अनामिका ने पेंटिंग ......अनामिका का  टेक्सटाइल डिजाइन में अच्छा काम था.....और राजश्री का ग्राफिक्स में......युवक ने भी पेंटिंग ही लिया था ...................ग्राफिक्स में...उसका काम भी बहुत अच्छा था.....    ......पर यह तो मैं  जरूर कहूँगी कि स्केचिंग में सुरेखा को छोड़ कर बाकि हम तीनो का हाथ बहुत अच्छा नहीं था...............बस किसी तरह बना लिया जाता था..........सेश्नल्स पूरा करने के लिए..
          पेंटिंग   और   अप्लाइड    कि   साधारण   कक्षाएं   ऊपर   होती   थीं  .सीढ़ियों   से   जाने   पर   दाहिनी    तरफ पेंटिंग  और बाएँ   ओर  अप्लाइड   आर्ट्स ..........दोनों तरफ प्रवेश करते ही उस कक्ष का स्टोर होता था जहाँ पेंटिंग के लिए दादा जी तथा अप्लाइड  के लिए राम सजीवन जी स्टोरकीपर थे......जो बच्चो को उनके कार्य करने हेतु कागज़ और रंग आदि देते थे........(उस वक़्त फीस के साथ ही साल भर के काम करने के लिए सभी सामग्रियों का पैसा जमा करा लिया जाता था....और हम लोग साल भर अपने सेश्नल्स बनाने के लिए रंग और कागज़ अपने स्टोर से ले सकते थे...) वहां बड़ी आपाधापी रहती थी.......क्यों कि बहुत  से छात्र रंग और कागज़ लेते तो थे पर बनाते नहीं थे....और जब वो कागज़ ख़राब हो जाता था तो फिर फिर लेने जाते थे.....जिसके लिए सजीवन जी बहुत नाराज़ होते थे.....बहुत हाथ पैर जोड़ने पर फिर से देते थे...........वैसे ये नौबत कभी मेरे साथ नहीं आई.........पर अक्सर देखती थी कि लड़के बहुत रंग और कागज़ बर्बाद करते थे........अब जब सब खुद से खरीदना  पड़ता है तो लगता है कि कितना बेवकूफी का काम करते थे हम सब.............कलर प्लेट  में ढेरो रंग निकाल लेना और फिर काम हो जाने के बाद सारा रंग जाकर नाली में बहा देना.........फाइन आर्ट्स कि नाली भी रंग बिरंगी हो जाती थी..........अब वो नाली और पानी पीने के लिए लगे हुए नल ....सभी का काया कल्प हो चुका है.........सभी नए ढंग से बना दिए गए हैं......पहले पोस्टर बनाने के लिए जो कागज़ हम लोग बोर्ड पर चिपकाते थे.............वो वहीँ लान में एक दूसरे के सहयोग से पूरा किया जाता था..........पूरे बोर्ड को अच्छी तरह  गीला करना फिर पूरे कागज़ को अच्छी तरह भिगो कर बोर्ड पर चिपकाना और ब्राउन गम टेप  से चारो तरफ इस तरह दबा दबा कर चिपकाना कि किसी भी तरफ से उनके बीच  हवा न पहुंचे .....फिर भी हवा पंहुच ही जाती थी....और सूख जाने के बाद आलपिन से छेद कर वो हवा बाहर निकली जाती थी.....ताकि बनाते समय कोई बुलबुले न उठें और .......चित्र बनाते समय कोई परेशानी न हो........ये काम सुनने में तो बहुत आसान लगता था पर जरा सी भी कमी हो जाये तो नुक्सान उठाना पड़ता था.........बने बनाये हुए चित्र अपने आप फट जाते थे..........अपने एडमिशन  के थोड़े ही दिनों बाद  अपने एक सीनिअर के बनाये हुए पोस्टर के साथ हम लोग ये हादसा( ! ) देख चुके थे.......इस लिए हमेशा सचेत रहते थे......... ..हुआ ये कि हमारे एक सिनिअर  जिनका स्प्रे पेंटिंग का काम बहुत ही अच्छा था......बड़े मनोयोग से अपना प्रोजेक्ट वर्क बना रहे थे.......और वो चित्र इतना सुन्दर था कि हम सभी घंटो खड़े हो कर वो चित्र देखा करते थे.......एक नियम सा बन गया था कि रोज सुबह कॉलेज पहुँचने के बाद जाकर ये देखना कि वो चित्र कितना बन गया??......क्यों कि बहुत से हॉस्टल में रहने वाले छात्र शाम देर तक रुक कर भी काम किया करते थे......एक  दिन जब हम लोग सुबह वहां पहुचे तो देखा कि वो चित्र बीच से फट गया है......किसी ने फाड़ दिया  हो ये नहीं कहा जा सकता था ........क्यों कि चारो तरफ से लगा हुआ गम टेप वैसे  का वैसा ही था.............बाद में ये पता चला कि अगर ठीक से कागज़ न चिपका हो तो वो एक समय के बाद वो खुद से तड़क कर फट जाता  है........बहुत दुखी हुए हम लोग.........बाद में उस चित्र को सही किया गया पर ये बात हमेशा के लिए याद हो गई ...................ये सारी बाते आज भी आँखों के सामने जीवंत हैं......

21 comments:

  1. waah auntie bahut hi acha likha hai aapne fir se ek baar...sabhi baatein itni sajeev lagti hain jaise aankhon ke samne chal rahi ho, main kalpana kar sakta hun wo lal batti vohra sir ka room aur unke sath bachchon ka shararat karna...bahut sajeev hai...manna hoga aapki smaran shakti ko bhi..taarif ke kaabil hai..32 saal ho gaye hain fir bhi aapko saari baatein hubahoo yaad hain..kaun kis vishay me teevra hai sab yaad hai aapko...main to hal filhal ka hi bhul jata hun...khair bahut acha lagta hai aapke lekh padhkar ..pls aage ka jaldi likhiye...waiting for it :)

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  2. सच वह दिन कितने प्यारे थे।

    लगता है कि आप हिन्दी फीड एग्रगेटर के साथ पंजीकृत नहीं हैं यदि यह सच है तो उनके साथ अपने चिट्ठे को अवश्य पंजीकृत करा लें। बहुत से लोग आपके लेखों का आनन्द ले पायेंगे। हिन्दी फीड एग्रगेटर की सूची यहां है।

    कृपया वर्ड वेरीफिकेशन हटा लें। यह न केवल मेरी उम्र के लोगों को तंग करता है पर लोगों को टिप्पणी करने से भी हतोत्साहित करता है। आप चाहें तो इसकी जगह कमेंट मॉडरेशन का विकल्प ले लें।

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  3. कॉलेज के दिन कोई नहीं भूलता। वो शरारतें, वो मौजमस्ती सभी कुछ यादों के समंदर में कहीं न कहीं छुपा रहता है...बहुत अच्छा लिखा है...

    http://veenakesur.blogspot.com/

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  4. यादें तो यादें भुलाये नहीं भूलतीं - समय के साथ परिवेश में बदलाव भी स्म्रतियों को नहीं मिटा पाटा - अच्छा आलेख.

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  5. सच वह दिन कितने प्यारे थे।बहुत अच्छा लिखा है...

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  6. इस सुंदर से चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  7. kya baat hai.... aise din itni aasani se kaise bhulaye jaa sakte hain, ye to hamesha yad rahne wale din hai....

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  8. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  9. एक सुन्दर अभिब्यक्ति|
    आपने फिर से बीते दिनों की याद दिला दी
    धन्यवाद्|

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  10. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

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  11. स्वागत ,सुन्दर अभिव्यक्ति । शुभ कामनाएं ।

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  12. Itni sahajta ke saath saari baatein likhi hain aapne auntie ki kya kahun ? Har ek baat aapki hi nahi hamari aankho me bhi Jeewant hai...badhaaye hue wakye to aur bhi khoobsurat hain,aapki yaddasht ki tareef karni hogi, har kisi ka naam aapko poora yaad hai, Mujhe abhi college se nikale to 3 saal hi complete hue hain aur kaha jaye to bahuton ke naam yaad nahi hain...khair kuch bhi ho aap apna blog writing barkarar rakhiye isse hamein bahut kuchh dekhne, seekhne ko milta hai ...:)

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  13. thanks...rohit.......phir se sabkuchh dohrana achcha lag raha hai....khushi hai ki tumko bhi pasand aaya............

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  14. thanks..mridula ji.......bas kuchh yu hi likhne ka prayaas kiya hai.....doosri posts par bhi aapki pratikriya chaahoongi.....

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  15. mammy bahot hi zada sundar aur achcha likha hai.. mein ise padh ke poora BHU fine Arts dept. ghum aaii.. ek to mera poora dekha b hua hai.. isiliye, padh padh mahsoos kar sakti hu..
    mammy shabd kamm hai, tareef karne ko..itne achche se tumne feeling likhi hai ...
    bahot badhiya..
    Betu.

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  16. waise ye senior kaun hain Uncle to nahi ??

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  17. haaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaan......beta 100% sahiii..hehehhehehehhehe

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  18. जीवन्त अभिव्यक्ति ... बहुत सुन्दर...

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  19. जीवन्त अभिव्यक्ति... बहुत सुन्दर...

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