लिखिए अपनी भाषा में

Friday, November 29, 2013

कौन हैं ये ??




                  कोई इतना खडूस भी हो सकता है ये उन महाशय को देख के ही समझा जा सकता है.......कभी कभी लगता है कुछ शब्द कुछ खास लोगों के लिए ही बनाये जाते हैं तो ये शब्द भी उनके लिए ही गढ़ा गया है.......उन्ही के लिए इज़ाद किया गया है.....        मुस्कराहट जैसी चीज उनके चेहरे पर कभी नहीं दिख सकती....या शायद  कुछ बहुत ही ज्यादा भाग्यशाली    लोग होंगे  ,     जिन्हे ये देखने का सु अवसर मिला हो कि वे कभी मुस्कुराते भी होंगे......      उनकी .हंसी तो किसी विभूति या अवतार को ही दिख सकती  है   ,      हमारे जैसे साधारण जन को कभी नहीं.....
               हमेशा तने रहो , अकड़ कर चलो , और बोलो भी तो ऐसे कि फूल नहीं कांटे झड़ रहे हो......और कुछ भी बोलो तो ऐसे      जैसे सामने वाले पर अहसान लाद रहे हों.......और वो आपके सुमधुर (!) वचन सुनकर कहीं कृतार्थ न हो जाये.....    मुझे लगता है ऐसे लोग किसी तरह के गुमान में नहीं जीते ,....  बल्कि इस तरह से अपने को जीवन में ढाल लेते हैं .        कि वो वक़्त के साथ उनके व्यक्तित्व में झलकने लगता है....हर समय अपने चेहरे पर एक भारीपन और  गम्भीरता का लबादा ओढ़े रहने वाले  ये लोग ,     क्या सोचते हैं ?...क्या महसूस करते हैं ?....    और कब किस बात पर  किस तरह से रिएक्ट करते हैं ...     अनुमान लगाना मुश्किल है.... उनकी  हर  बात  से  यही  महसूस  होता  है          जैसे  ये  सारी  दुनिया  से  नाराज़  हैं ....कोई  भी  बात  इन्हे  प्रसन्न नहीं कर सकती .....  सारी दुनिया इनके जूते की नोंक पर है.....   और ....  .यदि इनकी बातो का कोई प्रति उत्तर देने का साहस कर ले तो ,उस से बड़ा  नाचीज कोई नहीं........   भले ही खुद किसी लायक न हों पर किसी को प्रसन्न या फलता फूलता नहीं देख सकते....      कोई यदि किसी बात पर खुश  है तो जरूर
 कोई न कोई गलत बात ही होगी  ऐसा इनका मानना होता है.....      जाहिर सी बात है ऐसे लोग इतने सेल्फ सेंटर्ड होते हैं कि अपने  नजदीक ,   अपने करीबियों को भी नहीं आने देते हैं.....    ऐसे लोग सज्जनता और विद्वता का आवरण ओढ़े  रहते हैं........    बड़ी बड़ी समाज सुधारक और , समाज को बदल डालो ,टाइप की संस्थाओं   से जुड़े रहते  हैं...      जब कि सच्चाई में ऐसा कुछ नहीं है, ये बेहद पुरातन पंथी....और हम नहीं बदलेंगे ( सुधरेंगे) टाइप के होते हैं ...दुनिया चाहे कहीं से कहीं चली जाये ये उसी सड़ियल और दकियानूस दायरे से बाहर नहीं निकल सकते......बाहर से ये खुद को कितना भी उदारवादी और दरियादिल दिखलायें ......   .पर सच कहूँ तो अंतर्मन से बहुत ही निकृष्ट होते हैं.......उन्हें  शायद  प्रकृति  ने  ही  ऐसा  बनाया  है  कि  उन्हें  अपने  सिवा  कोई  पसंद  ही  नहीं ,,,,,    और  अपने  सिवा  किसी  की  ख़ुशी  से  कोई  लेना  देना  नहीं .....न  ही  किसी  के  मान  सम्मान  की  कोई  फिकर ...   .पता  नहीं  क्यों  ऐसे  हैं  वो.... .........

Wednesday, November 27, 2013

मेरी आस्था

      





      मैं आस्तिक हूँ या नास्तिक ...यकीन  से नहीं कह सकती , शायद कोई भी स्थिति स्वीकार या अस्वीकार कर लेने के बीच की भी एक स्थिति होती है,, ... हाँ या ना के बीच वाली ,...तो वही स्थिति मेरी भी है......मैं प्रार्थना करती हूँ,... मैं ईश्वर भक्त हूँ,....अगाध श्रध्धा है मुझमे , ईश्वर के लिए,............ पर इसे एक नियमित रूप से एक रूटीन के रूप में जीवन में उतार पाने का अनुशासन मुझमे नहीं है,रोज सुबह शाम दैवी मूर्तियों को जगाने , भोग लगाने , उनके सामने घंटी बजाने  और फिर रात को उन्हें सुला कर सोने की न तो मुझे कभी उत्सुकता रही,     न ही वक़्त.....अन्य साथी लड़कियों ,    (और अब महिलाओं )   की तरह शुक्रवार या सोमवार के व्रत रखने की इच्छा नहीं हुई.....मुझे अभी भी ज्ञांत नहीं कि प्रदोष , एकादशी या सोमवती अमावस्या  क्या होती है ?...और क्यों मनाई जाती है ?/   
                घर में बचपन में  कभी देखा नहीं .....मम्मी कुछ समय तक तो करती थीं पर बाद में .....हम सब की बहुत ज्यादा रूचि नहीं देख कर   ....      सिर्फ सुबह नहाने के उपरान्त पूजा और साल में दो तीन व्रतों  तक ही सीमित हो गईं.......       पापा जी के विचारों से बहुत ज्यादा पूजा पाठ या व्यक्ति विशेष की भक्ति करना या घर परिवार की   उपेक्षा करके दिन रात भजन सत्संग (!!) में लीन रहना एक ढकोसला मात्र था ...   वे कभी कभी अपनी तार्किक बातों में ऐसी कटाक्ष पूर्ण कटूक्तियां कह देते थे ,        जो किसी भी धार्मिक व्यक्ति को बुरी लग सकती थीं.....यही हाल नाना जी का भी था,               वे मन से ईश्वर को मानते थे पर किसी पाखण्ड को नहीं.......अच्छी और सुधारक बातें...   हर धर्म में हैं....    पर उन्हें किसी देवी देवता का डर दिखा कर मनवाया जाये ये मैं उचित नहीं समझती.....     मुझे मंदिर , मस्जिद , गुरूद्वारे या चर्च में कोई भिन्नता नहीं लगती...  .मेरी दृष्टि में सब एक से ही हैं,,,    और मैं जब भी वहाँ जाती हूँ...   हर जगह मेरी एक ही प्रार्थना होती है ..और मन ही मन मैं एक ही इच्छा हर जगह रखती हूँ.......

               शायद ही हमने कभी पापा जी को मंदिर जाते या मन्त्र पढ़ कर घंटी बजाते  हुए      ,पूजा करते देखा हो,,,,सिर्फ दीवाली की रात जब लक्ष्मी गणेश की मूर्ति सजा कर पूरा परिवार वहाँ पूजा करने बैठता था,,,तब वे भी कुछ समय के लिए वहाँ हाथ जोड़ कर बैठते थे......      पर वहाँ भी विधिवत पूजा करना  उन्हें नहीं आता था.....या शायद हम सबको नहीं आता ....   .कि  कब अक्षत डालना है , फूल चढ़ाना है , या कब जल चढ़ाना है, कब सिन्दूर लगाना है या कब अगरबत्ती जलानी  है...   ..करते सब हैं...पर किसके बाद क्या करना है ?...ज्ञात नहीं........,मुझे लगता है जो भी करना है .      श्रध्धा के साथ करना चाहिए बस.....

           वैसे भी जिस तरह की किचिर पिचिर और गन्दगी हमारे मंदिरों में मचती है उसे क्या कहा जाये....   पंडितों और बाबाओं की छीना झपटी देख कर सिर्फ भाग आने का जी चाहता है,     वहाँ किसी तरह की कोई भक्ति या श्रध्धा नहीं पनपती......गन्दगी और कूड़ा देख कर ही जी घबराने लगता है,    और पूरा ध्यान अपने कपडे भीगने से बचने या फिसल कर गिर न पड़ें ,     इसी में लगा रहता है....धक्का मुक्की या पंडों की छीना झपटी , यजमान को लूट लेने की आतुरता देख कर बहुत क्षोभ होता है.....कुछ समय पूर्व अपने एक घनिष्ट पारिवारिक मित्र परिवार के साथ विंध्याचल जाना हुआ, वहाँ एक पण्डे ने हमें अपरिचित जान कर इतना ज्यादा परेशान किया जिसकी हद नहीं.....वो इस बुरी तरह पीछे पड़ गया ,,    ,हमारे मित्र के........ कि यही जी में आरहा था  ...... उस पण्डे को पीट कर धर दिया जाये....    जब मैंने उसे सख्ती से दुत्कार कर भगाया तो वह गाली गलौज पर उतर आया.....ऐसे समय में कौन सी श्रध्धा रह जाती है .......बस यही जी में आता है कि यहाँ से लौट चलें.....ऐसा ही कुछ अनुभव ....     बहराइच की एक प्रसिध्ध दरगाह पर भी देखने को मिला.....वहाँ भी हर स्थान पर पैसे चढाने के लिए जिस तरह मुल्ला लोग ज़िद कर रहे थे   और न देने वालो के साथ अभद्रता से व्यवहार कर रहे थे वो कहीं  से भी शोभनीय नहीं था........एक दम लूट खसोट मची हुई थी...जिसने ज्यादा पैसा दिया है उसे अंदर ले जाकर दर्शन कराये जाते हैं........कतार में भी धक्का मुक्की और बदतमीजी करते हुए .... .श्रद्धालु लड़कियों और युवतियों को किसी न किसी बहाने अश्लीलता से स्पर्श करना उनकी क्षुद्र नीयत का पता देता है.......
       इसके विपरीत चर्च और गुरुद्वारे में जाने  का मेरा  अनुभव बहुत अच्छा रहा.....कक्षा नौ और दस मैंने गुरु नानक खालसा कॉलेज वाराणसी से पास किया,..        .स्कूल के बगल में ही गुरुद्वारा था..जहाँ लगभग रोज ही जाना होता था,,,,,बेहद शांत और सुकून भरा माहौल,    जाते ही, मन को तसल्ली मिलती थी....  अच्छा रिजल्ट आये इसके लिए मैंने बाबा विश्वनाथ  के साथ साथ गुरु नानक देव से भी आशीष माँगा है.......

       वैसे ही कई बार चर्च जा कर भी बहुत अच्छा अनुभव हुआ,.....जैसे सचमुच किसी ईश्वरीय आश्रय में पहुँच गए हों....     न कोई धक्का मुक्की न छीना झपटी न कोई लूट खसोट....न ही यहाँ वहाँ पैसा चढाने की व्यर्थ की गुहार ......पता नहीं हम कब सीखेंगे...     .इतने धैर्य और तमीज से पेश आना ....बिना किसी को डिस्टर्ब किये . चुपचाप  आकर बेंच पर बैठ जाना.......    साफसुथरे   सुन्दर परिवेश...में ..और एक गहन शांति में डूब जाना ....

             कुछ ऐसा ही अनुभव लोटस टेम्पल में जा कर भी हुआ.....बेहद शांत सुकून दायक और आध्यात्मिक माहौल में किसी शून्य में विचरण करने जैसी अनुभूति ......      सच कहूँ तो वहाँ सिर्फ चुपचाप बैठे रहने से ही इतनी पॉजिटिव एनर्जी मिलती है ,       जो अन्य कहीं सम्भव नहीं.........भगवान् में मेरा अटूट विश्वास है पर अंध विश्वास नहीं...    .मुझे लगता है भगवान् हर जगह है आप जहाँ चाहो खड़े हो कर उसकी प्रार्थना कर सकते हैं...उन्हें शुक्रिया कह सकते हैं....   फलां दिन , फलां मंदिर जाने  से ही भगवान ज्यादा खुश होते हैं,     या फलां व्रत के जरिये ही मन्नत पूरी होती है      या रोज भगवान् के आगे घंटी बजाना जरूरी है,      इन बातो में मुझे जरा भी यकीन नहीं......मैं सोते जागते ,     चलते फिरते ,खाना बनाते या खाते समय     कभी भी कहीं भी भगवान को याद कर सकती हूँ       और मुझे पूरा यकीन है कि वे मेरी प्रार्थना कभी अनसुनी नहीं कर सकते ......हाँ ध्यान जैसी चीज मुझे पसंद है    उसके लिए मैं जरूर समय देती हूँ ..  .बल्कि निद्रा वस्था से ठीक पहले मैं इसी मुद्रा में होती हूँ....उस समय मैं यही सोचती हूँ  कि मैंने आज किसी को कोई तकलीफ तो नहीं दी....., किसी की उपेक्षा तो नहीं की....       किसी का मज़ाक़ तो नहीं उडाया.....और जब इसका जवाब न में आता है तो तो यकीन मानिये जो संतुष्टि या सुकून मिलता है उसका जवाब नहीं.........

भगवान ने मेरी हर बात सुनी है......और ज्यादा तर मानी भी है.....और मुझे पूरा विश्वास है की आगे भी ऐसा ही होगा.....आमीन

Friday, November 8, 2013

बनारस डायरी.....





इधर काफी दिनों बाद बनारस जाना हुआ ...बिटिया कि शादी  के सामान की खरीदारी   के सिलसिले में , पिछले साल दो ,तीन बार जाना हुआ , और उसके पहले २०१० में जब मम्मी नहीं रही थी.....मम्मी के साथ आखिरी दीवाली २००९ में मनाई थी........इस बार मम्मी पापा दोनों ही लोग नहीं मिले....



बनारस से भाइयों भाभी और बच्चों का बार बार आने का आग्रह रहा,...बहुत अच्छा महसूस हो रहा था....स्वयं हमारी भी काफी इच्छा हो रही थी   बनारस की बहुत याद आरही थी.......

मम्मी पापा जी के बिना बनारस की कल्पना करना भी बड़ी तकलीफ देता है.....पर अब धीरे धीरे यकीन करना ही पड़ रहा है......ख़ुशी इसी बात की है कि   पिंकी ने काफी हद तक मम्मी का स्थान भरने की चेष्टा की है और काफी अंशों तक उसमे सफल भी है.......


बहुत अच्छा लगा इस बार, तीन चार दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला , खूब  आराम किया...पूरा मायके का सुख उठाया  आराम से बैठे बैठे चाय , नाश्ता, खाना  ,स्वादिष्ट भोजन,  बच्चों का बेहद प्यार और अपनापन ,...भाई के बच्चे बहुत प्यारे हैं...बेहद समझदार और स्नेही .....डुग्गू को तो सभी कहते हैं...मुझ पर गई है... ...कभी कभी मुझे भी लगता है..उसका स्वभाव काफी कुछ मुझ सा .है  .भगवान् सभी को लम्बी उम्र दें....


साफ़ सुथरा सजा संवरा घर पिंकी के सुघड़ गृहणी होने का आभास करा रहा था.... बहुत ख़ुशी हो रही है कि पिंकी ने सब कुछ बहुत अच्छी तरह सम्भाल लिया है.......मम्मी की बनाई हुई  ५०-५२ साल पुरानी गृहस्थी....अभी भी बहुत अच्छी तरह बनी हुई है....



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....  रंजन     के    लिए    थोड़ी     चिंता     रहती       है उसे  समझना  बड़ा दुरूह  कार्य  है , कौन  सी  बात  उसे  बुरी  लग  जायेगी  और किस  बात  पर वो  खुश  हो जायेगा   , पता  ही  नहीं  चलता  , मैं समझती  हूँ कि उम्र  के इस  मोड़  आकर  स्वभाव  में  परिवर्तन   हो पाना  बड़ा  कठिन  है  पर   तसल्ली  है , कि पिंकी ने  काफी  कुछ एडजस्ट  कर  लिया  है..... बाक़ी .  सब लोग  तो  देख  सुन कर  के...समझा  के अलग हो जाते हैं पर जो सब कुछ सहता और निभाता है वही जानता है....इसके लिए मैं पिंकी की ह्रदय से आभारी हूँ.... ..




भगवान् से यही प्रार्थना है कि वे मेरे प्यारे छोटे  भाई को  सहन शक्ति और समझदारी दें और हम सबको धैर्य......आमीन...

दीवाली काफी अच्छी रही.... पप्पू पिंकी की इच्छा रही कि     पतिदेव दीवाली पूजा का प्रारम्भ करें , तो इन्होने बड़े ही सुन्दर तरीके से सारा आयोजन किया ....और पूजा की गई....धनतेरस पर कुछ बर्तन और चांदी के सिक्के खरीदे गए...




सोने के गहने इत्यादि खरीद पाना तो अब  शायद बच्चों  की शादियों में ही सम्भव हो पाये......या शायद डौंडिया खेड़ा की खुदाई में मिलने वाले १००० हजार टन सोने  (!!!!)  की प्रतीक्षा करनी होगी सबको......

दुःख इस बात का है कि हमारे पूर्वजो (ससुराल या मायके ) में भी कोई ऐसा नहीं रहा , जिसने कोई मटकी ,मटका या घड़ा ....सोने की मोहरें भर के कहीं गाड़ रखा हो........अब तो यही मनाते हैं...... कि भगवान् देना तो छप्पर फाड़ के देना ,..पर इतना जरूर देना कि छप्पर बनवाने के बाद भी कुछ बचा रहे....क्यों कि आज कल रिनोवेशन में भी काफी खर्च हो जाता है.....स्वयं हम भुक्त भोगी हैं.....



इस बार मैंने फेसबुक पर सूचित कर दिया था , कि मैं बनारस आरही हूँ, यह जान कर बड़ी ख़ुशी हुई कि मेरे बनारस के कुछ मित्र बड़े उत्सुक रहे मिलने के लिए.....पर समय कम होने के कारण कई मित्रों की सूची में गणेशन (मेरा फाइन आर्ट्स कॉलेज का क्लासमेट )    को सबसे ज्यादा तरजीह दी हमने ...क्यों कि इधर बीच कई बार आना जाना हुआ पर हम लोग मिल नहीं पाये थे.....इस बार उसे फोन करके आने का कार्यक्रम तय किया और समय से पहुँच भी गए.......


बहुत आंतरिक ख़ुशी हुई कि  लगभग २५- २६ साल के बाद मिलने पर भी बड़ी आत्मीय मुलाकात रही....(फेसबुक की आभारी हूँ कि बहुत से पुराने मित्रों को फिर से मिलाया ) 



उसकी पत्नी से पहली बार मुलाकात हुई....बड़े स्नेह और अपनेपन से उनके परिवार ने हमारा स्वागत किया ....बेहद खूबसूरती से सजा हुआ उनका घर , और उनकी आवभगत से हम सब बहुत खुश हुए......फिर तो दो घंटे कैसे बीते पता ही नहीं चला....बहुत पुरानी पुरानी बातें, अपने सुख दुःख, क्या क्या खोया क्या क्या पाया ,...आपस में बांटी गई....अपनी अपनी उपलब्धियां गिनाई गईं...गणेशन ने भी इस बीच में काफी अच्छा काम और नाम कर लिया है,....काफी हार्दिक प्रसन्नता हुई..... अब हम ऐसी उम्र में पहुँच चुके हैं जब मित्रों की उपलब्धियों से ईर्ष्या नहीं होती......बल्कि ख़ुशी होती है कि हम एक ऐसे जाने  मानें व्यक्तित्व के मित्र  हैं....   अच्छी और मधुर स्मृतियों और पुनः मिलने की  इच्छा के साथ हमने विदा ली....आते समय गणेशन की पत्नी ने दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार सुहागिनों के सौभाग्य चिन्ह मुझे भेंट किये....मुझे बहुत अच्छा लगा. 


भाई और उसकी बिटिया हमें स्टेशन तक छोड़ने के लिए आये....उसका बेटा  बहुत उदास था और हमारे आने पर रो पड़ा......रंजन की इच्छा थी आने की …….  पर कुछ लम्बी छुट्टियां हो मेरी ..  तो उसे बुलाऊंगी.......

रास्ते   भर बच्चों की और सभी की याद आती रही... रंजन की कुछ ज्यादा ही.....


कुछ ऐसी विवशताएं होती हैं...की उनका कोई उपाय नहीं ....सब अपने अपने जीवन ढर्रे में इस तरह बंधे हुए हैं         उनसे निजात नहीं पाई जा सकती.......मेरे बच्चे भी अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं....पर कुछ  ऐसे  ही पल  निकाल    के  सबसे   मिलना जुलना कुछ तसल्ली देता है.......



मनकापुर वापस आ  गई हूँ....

फिर वही पुरानी रूटीन में लौट आई हूँ.....कल से फिर वही उबाऊ दिन चर्या  ...... वही उकताने वाले चेहरे देखने हैं.....जिन्हे देखते देखते थक चुकी हूँ ....पर फिर भी जिन्हे देखे बिना चैन नहीं......