लिखिए अपनी भाषा में

Monday, December 20, 2021

एक दिन सब बदल जाएगा न!!!


आज बेटे ने फोन को फिर से रीबूट किया.... और चूंकि मैने नोट्स(जिसे मैं मेरी डिजिटल डायरी की तरह इस्तेमाल करती हूं) में लिखा हुआ बहुत सा मैटर, कुछ आधे-अधूरे ब्लॉग्स वो बेटे को सेव करने को नहीं कहा था... इस लिए नये सिरे से फोन को रिन्यू करने में मेरा तीन चार साल का सब लिखा पढा हुआ डिलीट हो गया...... गनीमत है कि कुछ चीजें मैने ब्लॉगर में पोस्ट कर दी थीं.... पर अब मुझे कुछ भी याद नहीं और क्या क्या लिखा था और अब हाथ मलने के सिवा और कोई चारा नहीं है मेरे पास..... बेटे को भी अब क्या कहूँ....अब तो जो होना था वो हो चुका है..... मेरे पास बरसों पहले, कुछ बरसों पुरानी कॉपियां थी। उनमें लिखी बहुत सी चीजों को ब्लॉग पोस्ट के साथ शेयर कर दिया करती थी।अभी भी तमाम बातें इधर उधर पन्नों कागजों में लिखी पड़ी है.....
कई बार अपनी फाइल्स को एक साथ एक जगह सेव कर लेना चाहती थी, मगर ये आजतक नहीं हो सका......फिर मैने भी उसे भुला दिया। मैं कौन सी इतनी बड़ी लेखिका हूँ कि लोग मेरा लिखा पढने के लिए मरे जा  रहे हैं..... छोड़ो...
"याहू", "आर्कुट" वगैरह पर कितने अच्छे (बुरे भी) लोगों से मुलाकात हुई.... कितनी अच्छी कविताओं कहानियों, लेखों, विचारों का आदान-प्रदान हुआ..... उनके अनगिनत नाम है। बहुत से नाम तो मैं भूल भी चुकी हूँ।फेसबुक से जुड़ी तो वहां भी अनगिनत, प्रिय अप्रिय भूले बिसरे मित्रों से मुलाकात हुई.... ऐसे ऐसे श्रेष्ठ और प्रसिद्ध लेखकों कवियों से परिचय हुआ जिनके विषय में सिर्फ पढा था.... सुना था.. कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जिन्हें बचपन से पढती चली आ रही हूँ वो कभी मुझे मेरे जन्म दिन पर मुबारकबाद भी देंगे....कहने में ये छोटी या हल्की बात लग सकती है पर मेरे लिए ये बहुत खुशी की बात है...
इंस्टाग्राम आया वहां कितनी फोटोज पोस्ट कीं.... अब वहां भी विज्ञापन और अनचाही पोस्ट्स ने क़ब्ज़ा कर लिया है.... फिर भी अपनी सब तस्वीरें कम से कम एक साथ दिख जाती हैं।

कभी मैं डरती हूँ कि कुछ बेहद ज़रूरी तस्वीरें या जो कुछ भी ऊलजलूल मैं नेट पर पढती लिखती रहती हूँ वो कहीं अचानक एक दिन लुप्त न हो जाएं....

लेकिन मैंने महसूस किया है कि समय के साथ तस्वीरों और उनके कारणों से मोहभंग होता रहता है। एक अरसे बाद  उनके प्रति उदासीनता सी आने लगती है.... इसलिए अब  ज़्यादा नहीं सोचती।

जीवन जा रहा है क्या..... लगभग जा ही चुका है। हां कुछ हसरतें बची हैं। पर समय के साथ उनपर भी गर्द जम जाएगी। अब बहुत सी चीजों से मोह नहीं रहा....सच में समय के साथ हर चीज़ से मोह खत्म हो जाता है.

मेरे  तमाम चित्र खो गए। कविताएं खो गई। कहानियों के ड्राफ्ट्स इधर उधर हो गए....बहुत कुछ करना चाहती हूँ.... लिखना भी और पढना भी....इधर दो सालों से स्थितियाँ बहुत बदल गई हैं.... सब कुछ डिस्टर्ब है... एक डर, हदस सा बैठ गया है मन में....आसपास इतना कुछ खो गया है कि अब और खोने के डर से बेचैनी होती है....
कुछ सोचती हूँ मगर फिर रहने देती हूँ।
एक दिन सब ठीक हो जाएगा यही सोचती हूँ..... और शायद बस यही उम्मीद रहनी भी  चाहिए....
पर कई बार वो एक दिन कब तक आएगा पता नहीं..... वो दिन आने में बहुत दिन लग जाते हैं न..
कभी कभी बहुत लोगों से घिरे होने पर भी बहुत अकेलापन महसूस होता है न!!! ये क्यों नहीं जान पाते सब....
जब हम  खुद की ही  पहुँच से दूर हों तब?? इनदिनों...कभी-कभी बहुत कुछ उलझा हुआ जान कर भी कुछ सुलझाने का मन नहीं करता......
जब कुछ समझ न आए तब क्या करना चाहिए पता नहीं...

* * * 

😔😔

जब वक्त पडे़ या मिले  
तब रो लेना चाहिये।
चीख लेना चाहिये ,
वरना ये रूदन
 कभी अट्टहास बन फूट पड़ता है 
बता देना चाहिये किसी को.... 
जो अपना हो. 
किसी भी तरह 
कि ये पीड़ा असहनीय है।
पर हम वक्त पर रोते कहाँ हैं?

सोचते हैं ..
अभी रोने का वक्त नहीं 
अभी ये करना है 
वो करना है..
मजबूत दीवाल की तरह खड़े रहना है अटल.... 
नहीं समझ पाते 
कि ये पीड़ा, ये दर्द, दीमक बन जाते हैं 
और खा जाते हैं धीरे -धीरे 
हमारी बेवक्त बेफिक्र वाली हँसी को...... 

Friday, December 17, 2021

यूँ ही....

स्मृतियों में कोई जी नहीं सकता लेकिन स्मृतियों के बिना भी जीवन खाली ही होता है..! ! हालांकि मां थीं घरपर लेकिन  जब पापा जी के जाने के बाद बेहद सीरियस हो गई थीं...... मां वो मां नहीं रह गई थीं, बुझी बुझी सी, बेहद हताश कहीं अंदर तक..... और मैं  इन सबको सदा के लिए अपने पास,  सशरीर रख लेना चाहती थी। मैं कभी नहीं खोना चाहती थी अपने पैरेंट्स को... 
         पता नहीं कैसी मनःस्थिति हो गई है इन दिनों.... एक उदासीनता से घिर रही हूँ जैसे.... चाय पीते-पीते उकता कर छोड़ देती हूं। अपने पसंदीदा गाने सुनते हुए भी बीच मे खीझकर बन्द कर देती हूं.... भूल जाती हूँ कि किताब कहाँ तक पढ़ी थी और तो और बुकमार्क लगाने के बाद भी पिछला पढ़ा याद नहीं आता।  मतलब कुछ भी हो रहा है... । मूवी देखना शुरू करती हूं और खत्म नहीं करती..... बीच में ही छोड़ देती हूँ...
रह- रहकर एक काश आस पास फटकता रहता है,एक अधूरी कहानी जहन में घूमती रहती है। बहुत कुछ करने को पड़ा है ,सिलेबस खत्म करना है। किताब खत्म करनी है । ईजल पर लगी आधी अधूरी पेंटिंग्स पूरी करनी हैं.... कबसे एक ही नावेल के चार पन्ने हर रोज पढ़ कर पलट कर सो जाती हूँ।
वक्त गुजर गया है ,सबकुछ वैसा ही है जैसे होता आया है हमेशा। जिंदगी अपनी गति से आगे बढ़ रही है पर मैं जैसे किसी एक पल में रुक जा रही हूँ..ठहर जारही हूँ..
आगे बढ़ना जरूरी है और कोई विकल्प भी नहीं है पर जैसे मैं खुद को ही धकेल धकेल कर आगे बढ़ रही हूं....... पूरी उम्मीद है कि फिर वो दिन लौटेंगे , तब तक बस यही दुआ है.... सबकी जोड़ियां बनी रहें..... हर माँ का बच्चा महफ़ूज़ रहे हर बच्चे के सिर पर माँ बाप का साया रहे .....आमीन!!!!