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Friday, December 2, 2011

मेरी प्रिय किताबें और मैं.....

                            




                     मुझे किताबों से अच्छा  कोई गिफ्ट नहीं लगता ........आज  ही नहीं बचपन से ही किताबो के प्रति जो मेरा प्रेम भाव बना हुआ है..........(बेशक कोर्स की किताबों को छोड़  कर ) वो आज भी वैसे ही बरकरार है......किताबों को देख कर ............मैं खुद को रोक ही नहीं पाती..............अगर मुझसे पूछा जाये .............जीवन  में सबसे सुखद क्षण  कौन से होंगे  आपके लिए.?? .......तो मैं यही कहूँगी.....छुट्टी का दिन......साफ़ स्वच्छ बिस्तर......हाथ में चाय से भरा  मेरा मनपसंद बड़ा मग  ...जो मेरे बेटे ने मुझे गिफ्ट किया है......(जिस पर लिखा है ..यू आर द  बेस्ट मदर .).......और  मेरे मनपसंद  साहित्यकार.........(जिनकी लिस्ट बहुत लम्बी है ) की खूब बढ़िया किताब... ......नहाने धोने और खाने की कोई जल्दी नहीं........  इस से ज्यादा बढ़िया दिन मेरे लिए और कोई नहीं हो सकता ...........


                           इधर बहुत दिनों से पेंडिंग   पड़ा हुआ काम .....अपनी किताबो की आलमारी साफ़ करना....आखिर इस दशहरा और दीवाली की छुट्टियों में  हमने  निबटा ही डाला.......इतनी सारी किताबो की साजसंभाल  ...सचमुच  एक बड़ा भारी काम है......सारी किताबों को निकाल कर धूप दिखाना....सफाई से पोंछ कर कटी फटी जगहों को चिपकाना  ........कहीं जरूरत हो तो जिल्द चढ़ाना.....बहुत दिल कडा करके कुछ ऐसी किताबें .......जो सचमुच एक कबाड़  ही बन चुकी थीं उन्हें हटाना....(मैं मानती हूँ कि किताबें कभी भी कबाड़ नहीं हो सकती )पर सचमुच कुछ इस हाल में आ चुकी थी कि जिनके पन्ने छू भर लेने से मिटटी में मिल जाने को आतुर थे.....तो उन्हें मृत ही घोषित कर दिया हमने........बहुत  सारी  ऐसी पत्रिकाएँ ......जिनकी अब कोई आवश्यकता नहीं रही....बहुत सी अखबारों की कतरनें........पुराने अखबार......जो पता नहीं किस कारण से अभी तक संभाल कर रक्खे  गए थे.....उनको पूरा खोल खोल कर देखना कि.... क्या पता कुछ ऐसा निकल ही आये...जो जरूरी हो.......पापा जी के पुराने बक्से में भी ऐसा बहुत कुछ हुआ करता था.....पापा जी की डायरियां........ उनके लिखे हुए नोट्स.........कुछ छोटे छोटे  संस्मरण.........कोई खास आर्टिकल.......कुछ विशेष.......लेख.......जो कभी काम नहीं आ सके   .....पुरानी पत्रिकाओं से काट कर निकाले हुए.....कविताओं के संकलन.........मम्मी कितना नाराज होती थी........कि क्या ये बेमतलब का बवाल....... काट काट कर इकठ्ठा करते रहते हैं.....तो पापा जी उनको यही कहते थे देखना ये सब मेरी बेटी संभाल के रखेगी........मुझे बहुत दुःख है .....पापा जी ....कि........... मैं नहीं संभाल पाई उन्हें...... अब अपना ही इकठ्ठा किया हुआ.........देख के लगता है कि क्यों जोड़ रही हूँ ये सब???...कौन पढ़ेगा??.........फिर    भी  बटोरती  ही  जा  रही  हूँ ........
                 कितनी ही किताबें   ऐसी निकल आई .........जिन्हें एक अरसे बाद देखने से ये महसूस हो रहा है..... कि वे मेरे लिए बिलकुल नई  हैं ...फिर  से उन्हें पढने में वैसा   ही आनंद  आएगा ...........अभी २५ सितम्बर को पतिदेव  से उपहार में मिली १२ किताबो में से ४ किताबें  भी अभी नहीं पूरी नहीं पढ़ पाई हूँ.........

               मैं क्यों पढ़ती हूँ ?? ....या बिना पढ़े क्यों नहीं रह पाती हूँ??..या हर समय क्यों पढ़ती रहती हूँ ??........... ये मेरे लिए बहुत विकट प्रश्न है..........मैं कुछ भी पढ़ सकती हूँ.....अगर पढने के लिए कुछ नहीं है तो पंचांग और रेलवे टाइम टेबल  से लेकर फ़ोन डाइरेक्टरी  तक ....झाडू लगते वक़्त कूड़े में पड़े चिरकुट  तक  सब कुछ  पढ़ लेती हूँ......और मजे की बात है सबमे कुछ न कुछ अच्छा मिल ही जाता है....अभी मम्मी के नहीं रहने पर जो उनके लिए पूजा इत्यादि  हुई थी....उस वक़्त पूजा के लिए कपूर जिस पुडिया में लपेट कर लाया गया था......वो पुडिया संयोग वश मैंने ही खोली........और आदतन उसमे .....लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ पढने का लोभ ......नहीं संवरण कर पाई.....और मुझे देख कर बड़ी ही हैरत और दुःख हुआ...कि वे पंक्तियाँ किसी ...बच्चे ने  अपनी माँ के लिए लिखी थी...........शायद किसी डायरी का पन्ना था वो.......उस माँ के लिए जो शायद घर छोड़ के चली गई थी या दुनिया छोड़ के ........ये साफ़ नहीं था...पर उस बच्चे का पूरा दुःख बयां हो  रहा था........वो पृष्ठ आज भी मेरे पास सुरक्षित है........हम सभी मम्मी के लिए  दुखित थे......उसमे उस पृष्ठ  ने जैसे   मरहम का काम किया.......

                      अपने यहाँ की घरेलू सेविका  सोना को देखती हूँ .......जो एक अक्षर भी नहीं पढ़ सकती.......तो यही सोचती हूँ की उसे क्या बिलकुल भी दुःख नहीं होता होगा ??/.........इतनी रंगबिरंगी सुन्दर पुस्तकें देख कर उसमे लिखे हुए शब्दों को देख कर ..........कि आखिर उनमे  ऐसा क्या लिखा होगा??.........उसे कोई उत्सुकता  नहीं जगती होगी???.................मुझे बहुत हैरत और दुःख हुआ.............जब उसने मुझसे पूछा कि आखिर मैं इतनी बड़ी बड़ी पेंटिंग्स क्यों बनाती हूँ और उनका उपयोग क्या है?...........मैं समझ नहीं पाई कि... उसे क्या उत्तर दूं ???........इतनी सारी किताबें क्यों खरीदती हूँ और ........जब उन सब  किताबों की पढ़ लिया गया है .......तो बजाये  रद्दी वाले को बेच देने के इन्हें आलमारी क्यों सजा के रखा गया है????.......अब इस तरह की बात करने वाले के प्रश्नों का कोई उत्तर ........समझ में आता है क्या????..सिवा दांत  पीस के रह जाने  के..........या फिर अपना सर पीट लेने के......

6 comments:

  1. bahut sundar...... kitabon ka mahatw(importance) padhne k saukeen hi smjh skte hain....duniya me aap manoranjan k hr saadhan se bore ho skten hain parantu kitaabon se kbhi nai..

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  2. सचमुच .....बिलकुल सही बात....किताबें हमेशा अच्छी दोस्त साबित होती हैं....वो कभी आपसे नाराज़ नहीं होती......कभी आपकी बुराई नहीं करती ....हमेशा आपका मूड सही कर देती हैं......

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  3. bahot sundar likha hai mammy.. babu aur hum hai na tumhari kitaabe samhaal k rakhne k liye.. humare baad ka nahi pata.. per tum apna mann mat dukhi kiya karo.. hamesha tum yahi bolti ho..ki tumne itni kitaabe kyu jutaii hai :( isiliye mujhe b dukh hota hai.. tumhe acha lagta hai, isiliye tum padhti ho.. isiliye..
    hum log jab tak hai, tab tak kisi chiz k liye mat dukhi ho..

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  4. kitaabein padhna shayad ek aisa shauk ya kahein to aadat hai jo shayad duniya me kabhi bhi khatam nahi hoga...chahe wo bhi koi bhi tareeka ho books, online, newspaper ya e-book...bahut acha likha hai auntie aapne...:)

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  5. तुम लोगो से यही उम्मीद है बेटा.......बिलकुल संभाल के रखना....किताबें ही ऐसी चीज हैं जो कभी पुरानी नहीं होती.......जब भी पढ़ोगी.....हमेशा नई लगेंगी

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  6. Yah meri bhi aadat hai ..mai kuchh bhi pdhati rahti hoon..bas pdhna hai so padhna ...bahut bdhiya lekh

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