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Thursday, April 23, 2026

ऋषिकेश -हरिद्वार यात्रा 💜💜

इस 15 तारीख को हम दोनों, बेटी-दामाद और हमारे नन्हे नाती के साथ हरिद्वार-ऋषिकेश की यात्रा पर निकले। तीन पीढ़ियाँ एक साथ, एक ही गाड़ी में — सफर शुरू होते ही मन खुश हो गया.......धूप और गरमी तो थी पर एसी कार में बहुत ज्यादा  पता नही  लगा .....


सबसे पहले हम रूड़की पहुँचे, जहाँ से रोहित(दामाद जी) ने IIT किया है। कॉलेज का कैंपस देखते ही उनकी आँखों में चमक आ गई.... "यही वो हॉस्टल है जहां हम रहते थे, "यहाँ से लाइब्रेरी जाते थे'यहां पर आडिटोरियम है,यहां क्लासेज होती थीं, एक-एक बिल्डिंग के साथ पुरानी कहानियाँ बाहर आने लगीं.... बेटी भी कॉलेज के दिनों के किस्से सुनकर हँस रही थी,उसने बहुत सी फोटोज लीं और वीडियोज़ बनाए , वहीं के कैंटीन में चाय समोसे का आनंद लिया ...... रियो हैरान था कि "पापा यहाँ पढ़ते थे?,हमको भी पढ़ना है यहां😄😄😄😄,अभी वो यूकेजी में है पर 13-14 साल के बाद की पढ़ाई का कार्यक्रम बना लिया उसने  ....और पापा की तरह मैथ्स ही पढ़ना है ये भी तय कर लिया......उसके लिए तो पापा सुपरहीरो बन गए....पुरानी यादें ताज़ा हो गईं, दिल भर आया.....बेहद खूबसूरत  लोकेशन है रूड़की आईटीआई की.....एडमिन बिल्डिंग मे  जाकर बहुत अच्छा लगा ,बहुत अच्छी तरह मेंटेंन है आज भी.....

        रूड़की से  ऋषिकेश आए और दो दिन वहीं रुके.....बेहद आराम दायक होटल,लजीज खाना, बेहतरीन खूबसूरत लोकेशन ,होटल की छत से चारों तरफ के दृश्यों ने मन मोह लिया....अपने पैरों की थोड़ी  तकलीफ  के बावजूद सभी जगह जाने की इच्छा थी,पर सीमित जगहों पर ही जा पाए हमलोग  ...भरत मंदिर में लगे कई सौ साल पुराना पेड़  जिसमें पीपल,बरगद और बेल एक साथ सम्मिलित हैं देखा...बीटल्स ग्रुप की स्मृति में बने कैफे में लंच लिया गया... जानकी झूले पर हो रही खूबसूरत लाइटिंग..... खूब ठंडी साफ हवा ....वहीं नदी किनारे बैठ कर चाय और भेलपुरी का आनंद ...बस मजा ही आ गया .....हर जगह  रियो सबसे आगे आगे भाग रहा था।  गंगा की तेज धार देखकर उसने पूछा, "नानी  ये सारा पानी  कहां जा रहा है बह के ??" गंगा किनारे संध्या आरती में वो भी ताली बजा-बजाकर मंत्र बोल रहा था..... त्रिवेणी घाट पर नदी में छोटे छोटे कंकड़ फेंकना , पहली बार आटो रिक्शा में बैठना भी उसके लिए मजेदार अनुभव था....— दो दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला.....ऋषिकेश  में बहुत अच्छा  लगा पर वहां के यातायात और ट्रैफिक व्यवस्था से काफी परेशानी  हुई. ...दस मिनट के रास्ता डेढ़ घंटे में पूरा हुआ. ....कोई सिस्टम नही, हर कोई  कहीं से भी घुसा चला आ रहा है ,बुरी तरह जाम लगा हुआ. .....इससे मन बहुत खिन्न हुआ. ...खैर ये तो हर जगह की हालत है क्या कहें! !!!

         ऋषिकेश से हरिद्वार आए और डेढ़ दिन रुके......होटल में लंच के बाद शाम को हर की पौड़ी की गंगा आरती में जाने का प्लान बना....हर की पौड़ी पहुंचते ही गंगा की ठंडी फुहारों ने स्वागत किया। नाती पहली बार गंगा आरती देख रहा था — दीयों की रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं... हमने सबने मिलकर माँ गंगा को प्रणाम किया, मैने  दो तीन  वीडियो बनाया ...... मन को जो सुकून मिला, वो शब्दों से परे है।वहां सभी ने खूबसूरत दृश्यों का मजा लिया.....बस मेरा कई मंदिरों  में जाना नही  हो पाया .....पैरों की तकलीफ से मैं ज्यादा  चल नहीं  पा रही थी .... बच्चे और पतिदेव  दर्शन कर के आए ,मैं हाथ जोड़कर  कार में ही प्रतीक्षा करती रही......

              अगले दिन......बेटी-दामाद की शादी की सालगिरह.....हम सब दिनभर घूमकर थके थे, पर हमारा 5 साल का नाती सबसे ज्यादा एक्साइटेड था....  सुबह से ही हैप्पी एनवरसरी मनाने के मूड में था..... डिनर के बाद होटल में उसने कार्ड बनाने  की जिद पकड़ ली...कागज कापी..पास में नहीं  थी...पर संयोग से पर्स में कलर पेंसिल का डिब्बा पड़ा  था....होटल के रूम में कुछ जरूरी  नोट्स वगैरह लिखने के लिए  जो लेटरपैड रखे रहते हैं  उनपर रियो की नजर पड़ गई  बस उसका काम हो गया ...दिनभर घूमकर सब थक गए थे पर रियो की आँखों में नींद नहीं थी....उसने "नानी के साथ सोना है "पहले  ही डिक्लेअर कर दिया था....वो जब भी आता है मेरे  पास ही बना रहता है ....उसकी मम्मी  का भी यही हाल रहता था....नानी  की बहुत दुलारी  रही है वो भी...

          रात 12 बजे तक रियो अपना कार्ड बनाने में लगा रहा..रात को होटल में सब सोने की तैयारी कर रहे थे, पर वो अपनी क्रेयॉन और कागज़ लेकर बैठ गया। बार-बार पूछता रहा , "नानी , मम्मी को कैसा कार्ड अच्छा लगेगा?" "नानी, मम्मा के लिए  हार्ट वाला कार्ड बनाएं?" हर 5 मिनट में नया सवाल..... टेढ़े-मेढ़े दिल, सितारे, और बड़े-बड़े लेटर्स में लिखा — Happy anniversary MOM-PAPA"दो  दिल बनाकर, स्टिकर चिपकाकर, रात 12 बजते ही मेरे साथ  नंगे पाँव दौड़कर उनके कमरे का दरवाज़ा खटखटाया......हैप्पी एनिवर्सरी मम्मा-पापा" — बहुत खुश आवाज़ में बोला और अपना बनाया कार्ड  दिया....बेटी की आँखें भर आईं, रोहित ने उसको गोद में उठा लिया.... रियो की एक्साइटमेंट देख के सच में उस कार्ड की कीमत किसी महंगे गिफ्ट से ज्यादा लगने लगी ......

बेटी ने रियो को सीने से लगा लिया, उसने अपनी समझ से जो तोहफा दिया, वो अनमोल था........

          दूसरे दिन नाश्ता करके हम लोग शांति कुंज गए.....बेहद शांत और पावन स्थान .....अंदर काफी  चलना पड़ता  है वहां ....मेरे साथ वही पैरों की दिक्कत बनी रही पर हिम्मत करके चलती रही.....सभी  जगहों के दर्शन किए .....मां गायत्री  की बेहद सुन्दर  प्रतिमा .....सभी  प्रांगण,कक्ष बेहद साफ सुथरे और दर्शनीय. ....थोड़ा  मौसम ठण्डा हो तो फिर जाने की इच्छा है... समधिन जी वहां की सक्रिय  कार्यकर्ता हैं......उनका पूरा परिवार गायत्री परिवार  से जुड़ा  है .....और अब तो हम सब भी जुड़ गए हैं .....वहां से हस्त निर्मित पूजा आसनी और दो चार सामान खरीदा......करीब साढ़े छह बजे  हरिद्वार से वापस चले....

ऐसी जगहों पर जाकर मन को बहुत शांति  सी मिलती है .......मां गायत्री  सब पर कृपा दृष्टि  बनाए रखें ....

            ये सिर्फ तीर्थ घूमना नहीं था। ये थी नाती के साथ एक अच्छी आउटिंग,  लौटते वक्त गाड़ी में रियो मेरी गोद में सो गया था, और मैं सोच रही थी— तीर्थ वही जहाँ अपनों का अपने प्यारों दुलारों का साथ हो.....


*

Thursday, March 12, 2026

यूं ही 😊😊

   "बाबूजी /माताजी एक्को गिलास पानी तक नहीं मांगे,सेवा का मौका दिए बिना ही चले गए!" यह सुनना कितना अच्छा लगता है न?  एक विश्रान्ति का बोध होता है...

अशक्त जीवन,बीमार और तीमारदार दोनों के लिए बोझ बन जाता है...🙏🏻

बुढ़ापा अपने आप में एक रोग है... 

 वैसे जब हम बहुत बूढ़े होंगे तो क्या स्थिति होगी पता नहीं ......पर वृद्धावस्था समर्पण और विपरीत गति की अवस्था है....... बुढ़ापा आ जाए और मन न मरे ये कष्टदायी स्थिति है.....

 सब बच्चों को माता-पिता को बूढ़ा  और लाचार  देखना दुःख ही देता है .......जो लोग चले गए पर अपने अंतिम समय में बहुत दुःख पाया वैसा किसी के भी साथ ना हो .........सबके बुजुर्ग चलते फिरते चले जायें बस उनके लिए ईश्वर के आगे हाथ ना जोड़ना पड़े कि हे ईश्वर अब इनको मुक्ति दे दे....

बुढ़ापा बहुत दुख देता है ......बड़े से बड़े की हेकड़ी ढीली कर देता है इंसान को औकात दिखा देता है कि देखो यही जीवन का सच है लंबी उम्र मिली तो ऐसे भी झेलना पड़ेगा......समय की ताकत हमें हरा देगी एक दिन .....

बस यही शब्द सत्य है......

एक समय आता है जब हमें अपने ही माता-पिता का अभिभावक बनना पड़ता है...... उनका खाना-पीना,पहनना ओढ़ना,चलना फिरना, मौसम के अनुरूप उनकी देखभाल करना सब कुछ करना पड़ता है.......और यह सावधानी भी बरतनी पड़ती हैं कि कहीं उन्हें यह ना लगे कि हमें उनसे ज्यादा समझ है और उन्हें सही गलत बताने लायक हो गए हैं.....

बहुत तसल्ली  होती है अब हमारे बच्चे  हमारे  अभिभावक बन गए  हैं......हमारी इच्छाओं, हमारी  जरूरतों , का पूरा ध्यान रखना, बिना कहे ही हर बात समझ जाना , ये सब देखते हुए  ये महसूस होता है कि हमने बच्चों के पालन-पोषण और संस्कारों  में कोई कमी नहीं रखी.....

जब बच्चों  की जिद पर हमने उनके पास आकर रहने की स्वीकृति दी तो सभी ने बहुत खुशी  जताई और बहुत भाग्यशाली कहा   कि आजकल जहां संतान मां-बाप को साथ रखने को तैयार नहीं  वहाँ  हमारे बच्चे  जिद करके हमें साथ ले आए 😊😊😊

Thursday, February 12, 2026

मैं...

कहीं जाने से पहले सफर के बारे में इतना सोच लेती हूं कि थक जाती हूं... 
कहीं नहीं जाने की आदत...
घर में ही घुसे रहने की आदत...
नये लोगों से परिचय करने के प्रति उदासीनता .......
बाहर न जाने के लिए सौ बहाने बनाती हूँ  मैं ....
इससे तो यही  पता चलता है कि मैं कितने खतरनाक तरीके से घर में बंद रहने के आदी हो चुकी हूँ. ....🙄🙄🙄🙄

Saturday, February 7, 2026

कढ़ी😊😊

इन दिनों दिल्ली एनसीआर में ठंड का आतंक पसरा हुआ है। बाहर बर्फीली हवाएं चल रही हैं और ठंड से लड़ने की जुगत चल रही है। कल  पकौड़ी  वाली कढ़ी बनाऊंगी...... सच कहूं तो मुझे बचपन से ही इसके अलावा कोई और कढ़ी कभी रास नहीं आई। वैसे मैने बहुत तरह की कढ़ियां खाई हैं..... मेरे लिए बेसन और दही के घोल में कुछ भी डाल देना कढ़ी नहीं है। वह तो बस एक समझौता है जिसे मानने के लिए मेरा मन कभी तैयार नहीं होता......
​कढ़ी बनाने का मेरा मिशन शुरू होता है बेसन की जमकर फेंटाई से....यह किसी युद्ध की तैयारी जैसा है....हाथ थकने लगते हैं, लेकिन मैं रुकती नहीं, क्योंकि मुझे पता है कि इसी फेंटाई के भीतर उन मुलायम पकोड़ियों का राज छुपा है जो मुंह में जाते ही घुल जाती हैं.....जब बेसन हवा की तरह हल्का हो जाता है, तब  कढ़ाई में सरसों का तेल धुआं उठने तक गरम करती हूं..... तेल से उठती वह तीखी गंध और उसमें सुनहरी होती बिना प्याज-पालक वाली सादी पकोड़ियां एक जादुई दृश्य रचती हैं.....
​ मेथी दाना, राई, साबुत मिर्च और करी पत्ता जैसे ही गरम तेल में गिरते हैं, एक शोर मचता है। ढेर सारी हींग की खुशबू जब पूरे घर में फैलती है, तो आसपड़ोस वालों को भी खबर हो जाती होगी कि आज कुछ विशेष पक रहा है......
​यह कढ़ी महज एक डिश नहीं, मेरी विरासत है....  मैंने यह हुनर अपनी मम्मी  से विरासत में पाया है... हमारे परिवार में शादी-ब्याह हो, जन्मदिन हो या मुंडन-जनेऊ, कढ़ी के बिना हर शुभ कार्य अधूरा है... यह हमारी सांस्कृतिक और उत्सवधर्मी परंपरा का वह अटूट हिस्सा है जो पीढ़ियों को जोड़ता है....इसे पकाने में धीरज चाहिए,हड़बड़ी नहीं. ...अंत में वह लम्हा आता है जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है... मैं एक छोटे बर्तन में शुद्ध देसी घी गरम करती हूं और उसमें लाल कश्मीरी मिर्च डालती हूं। जैसे ही यह तड़का सुनहरी कढ़ी के ऊपर गिरता है, एक गहरा लाल रंग पूरी सतह पर तैरने लगता है। ठंड के इस मौसम में जब इसे भात और आलू की मसालेदार सुनहरी भुजिया के साथ उठाओ बस्ससस ओहहहहहह!!!!!!!यह कढ़ी नहीं, स्वाद और यादों का एक ऐसा रोमांच है जिसे गाहे बगाहे जीना ही चाहिए.....

😊😊😊😊😊😊😊

Monday, January 12, 2026

सिलाई मशीन

मम्मी की दी हुई  चालीस साल पुरानी उषा सिलाई मशीन कई बार ठीक करायी लेकिन बच्चों ने बड़े होते ही घर के सिले कपड़े ख़ारिज कर दिये । लिहाज़ा मशीन बार बार जंग खाने और गड़बड़ाने लगी ....अब फिर से ठीक  कराई है .....पैडस्टल लगवाया  है....

 बिटिया के छोटे छोटे फ्राक,झबले और भी बहुत कुछ सिला पैच वर्क के बैड कवर, कुशन कवर, अपने गाउन, सलवार सूट यहाँ तक कि सोफे के कवर भी जिसके कोई सबूत नहीं .....कुछ कुछ बैग्स,पर्स ,कुशन्स वगैरह  इधर उधर मिल सकते हैं......
काश ये मशीन मेरे हक़ में बयान दे सकती । 🌹❤️

 अब तो मेरे जॉइंट्स में भी जंग लग रहा है...... अब हम दोनों एक जैसे ...😢😢😢😢

Monday, November 17, 2025

☹️

अमूमन मैं किसी भी मौसम में कमरे की खिड़की नहीं खोलती थी,बाहर दिन है या रात... या कौन सा मौसम आया और चला गया पता नहीं चलता था,यह मेरी अपनी दुनिया में छुपकर रहने की निंजा तकनीक थी......कभी सोचा करती थी जब मेरा अपना घर होगा तो उसमें खूब बड़ी सी बालकनी होगी.....सुंदर गमलों पौधों से सजी.......एक छत से लटकता झूला भी .....खूब बड़ी बड़ी खिडकियां बनवाऊंगी जिसमें लंबे शीशे होंगे......और जिनके करीब लेटने से आसमान ,तारे और चांद दिखाई देंगे.....चांदनी अंदर कमरे में  आएगी. ....सीधे  बिस्तर पर ......
अब अपना घर तो है  लंबी बालकनी भी है .....लंबे शीशों वाली खिडकियां  भी हैं...पर...चांद, तारे और आसमान नहीं  दिखाई देते....हमारे हिस्से का सूरज भी अब हमारा नहीं  रहा....चांद और सूरज देखे लंबा अरसा गुजर गया है .....

Friday, September 12, 2025

आजकल

रात बारिश की आवाज़ से नींद खुली... 
 
पूरे लंबे शीशों वाली खिड़की /दरवाजे से बारिश देखती रही। मौसम थोड़ा ठंढा हो गया है .... 

बे-मौसम बारिश.... 

बहुत थकी हूँ...... बिना काम के ही...... मैं आजकल बिना कुछ किए ही थक जाती हूँ.... हद है .... बेतुकी चीज़ें याद आने लगीं हैं...... सिरहाने आधी पढ़ी किताब रख कर आख़िरी बार कब सोई थी!!! 

बारिश के बाद का भीगा, प्यारा मौसम है। गोमतीनगर वाले घर में होती तो अपनी रॉकिंंग चेयर पर बैठ कर कॉफ़ी पीती...... यहाँ ग्रीन टी पी रही हूँ ..... सामने किताबों का कुतुब मीनार बनता जा रहा है.... कुछ अधूरी किताबें देखते हुए सोच रही हूँ , एक आध तो उठाऊं, पूरी करूं.. 
                 फोन बहुत समय बर्बाद करता है यार.. कहते हैं कि किताबें लाना और उन्हें न पढ़ना अपराध है, इस अपराध की सज़ा अगर दी जाती तो मुझे बहुत दिनों की जेल काटनी पड़ सकती थी......... मेरे पास भी अनपढी  किताबों का ढेर लगा है...... न पढ़ पाने का दुख महसूस कर रही हूँ........ कभी कभी मैं कोई किताब बहुत मूड से शुरू करती हूँ और बीच में रोजमर्रा के कुछ झंझट और सबसे ज्यादा ये जान का दुश्मन फोन अपनी टांग अड़ाकर मेरा  ध्यान भटका देते हैं. किताब बेचारी निरीह सी मुझे ताकती  रह जाती है क्योंकि फिर मेरा वो मूड भी तो जल्दी नहीं बनता. 

       कई बार एकसाथ कई किताबे पढती रहती हूँ एक साथ, थोड़ी थोड़ी पढ़कर अगली उठा ली जाती है और बुक मार्क लगा कर रखी हुई किताबों का ढेर सिरहाने बढता चला जाता है....... 

पुरानी बिना पढ़ी कई किताबें रैक में रखी हुई हैं, अपनी बारी की प्रतीक्षा में, ऐसे ही तमाम नयी किताबें पुरानी किताबों को पीछे धकिया देती हैं, वो बेचारी अपने पढ़े जाने की प्रतीक्षा में देखती रह जाती हैं. 

वक्त के साथ मेरा मिजाज़ भी बदलता रहता है. पहले एक बार में एक किताब पढ़ती थी.... अभी भी मन सभी किताबें तत्काल पढने का होता है और किसी के भी साथ न्याय नहीं कर पाती.... 
मन नहीं लग रहा है आज पता नहीं क्यों 😔😔😔😔

देखें कल का दिन कैसा जाता है.... 
.

Tuesday, July 15, 2025

यादें

कुछ  साल पहले  हिन्द युग्म प्रकाशन की तरफ से कुछ लेखकों के उपन्यासों का बहुत प्रचार किया जा रहा था....तो उसी से प्रभावित होकर मैने कुछ किताबें मंगाई थी. करीब आठ पुस्तकें मंगाई थी, दो तीन को छोड़कर बाकी मुझे पसंद नही आईं.... एक पुस्तक थी....नाम लिखना  उचित नही लग रहा....जिसका जिक्र मैने किया है....बल्कि उसे देख कर तो शर्मिंदा हो उठी मैं कवर से लेकर अंदर तक कई. अश्लील फोटोज ...और उपन्यास का तो कहना ही क्या.........और इस पुस्तक पर इसके लेखक वगैरह ऐसा बढ़ चढ़ के बोल रहे थे और आधुनिक बन रहे थे कि क्या कहें?  

              खैर मुझे तो ये नई वाली हिन्दी और गाली गलौज से भरे उपन्यास बहुत बुरे लगते हैं....शैलेश से मैने ये बात कही... तो उन्होंने कहा आप वापस कर दैं .....मैने लौटती डाक से वापस कर दिया..मैने उन्हें  लिखा था  ...ये पुस्तक  मंगाने का अफसोस हो रहा है......मुझे लगा था कि सिर्फ कवर तक बात होगी तो किसी तरह बरदाश्त कर लिया जायेगा.... ये तो अश्लील किताबों की श्रेणी मे रखने लायक है......जितनी भी किताबें  आज तक खरीदीं या  कहीं से खरीद कर मंगवाईं....उन सभी को जो सम्मान और प्यार मेरी छोटी सी लाइब्रेरी में मिला है....उनमे ये कहीं नही ठहरती.....ऐसा लग रहा है कि बहुत सी सभ्य शालीन महिलाओं के बीच कोई असभ्य और बेशर्मी की हद तक नग्न स्त्री खड़ी हो गई हो.....मुझे अब इस पुस्तक को छुपा के रखना पड़ेगा.....इस से अच्छा है कि मै इसे वापस भेज दूं.....मुझे नहीं चाहिए......प्लीज़ अपना एड्रेस भेजो कि मै तुम्हे इसे कोरियर कर सकूं.....बुरा मत मानना.....पर सचमुच....मुझे बहुत ही अशोभनीय लगी...या मैं इतनी आधुनिक नहीं हो पाई हूं अभी तक.....

Monday, June 30, 2025

,,😔😔

वो लोग जो बिना किसी शर्त के आपको चाहते हैं.....

आपकी इज्जत करते हैं....

आपके हर अच्छे बुरे समय में आपके साथ रहे हैं...

उनका दिल न दुखाएं...वो कहेंगे कुछ नहीं  ..बस चुप हो जाएंगे 

वे फिर भी अच्छे बनें रहेंगे, सहृदय रहेंगे....

लेकिन वे फिर आपको कभी उसी नज़र से नहीं देख पाएंगे....

बस,

वे धीरे-धीरे दूर होने लगेंगे.... 

अगर आपके जीवन में भी कोई ऐसा इंसान है

जो बिना शर्त आपके साथ खड़ा रहा हो,

तो ध्यान दें,

ऐसे किसी इंसान को खो देना कोई मामूली बात नहीं होती,

और जब वो लोग आपके जीवन से चले जाते हैं,

तो वे सच में चले जाते हैं.......

और उनके जाने के बाद जो खालीपन रह जाता है,

वो आसानी से नहीं भरता.....



😔😔

जब आप किसी ऐसे इंसान को चोट पहुँचाते हैं 

जिसका दिल सच्चा और साफ होता है, 

तो उसका जवाब तुरंत या साफ़ तौर पर नहीं आता,

वो चिल्लाते नहीं, इल्ज़ाम नहीं लगाते, कोई हंगामा नहीं करते.....

ऐसा लगता है मानो कुछ हुआ ही नहीं..

लेकिन अंदर ही अंदर बहुत कुछ बदल जाता है,

बस एक चुप, धीरे-धीरे होने वाला एहसास कि 

अब वो भरोसा पहले जैसा नहीं रहा......

क्योंकि जब एक सच्चे दिल वाले इंसान का भरोसा टूटता है,

तो वो लौटकर नहीं आता.....

Friday, March 21, 2025

छूटता हुआ घर😞😞😞

घर और ज़मीन पचास साल से ज़्यादा एक मालिक बरदाश्त नहीं करते…ये अपना मालिक बदलते ही है

या यूँ कहिए 

आप घर नही बदलते,,घर बदलता है,,अपने मालिक,,

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हमारा ही मकान देखिए,जब हम यहां रहने आए उस समय इस घर का मालिक कोई  और था,फिर हम इसके नए मालिक बने .....जब ये बन रहा था,तब हमने  और हमारे बच्चों  ने कितनी प्लानिंग की थी,,किचन ऐसा बनेगा,,कैसी टाइल्स लगेंगी. ...बाथरुम की साइज ये होना चाहिए,, ड्राइंग रूम में ये सोफा अच्छा लगेगा,फ्रिज कौन सा लेना है ...एसी और पंखे किस कंपनी के होंगे ,ऐसे कितने ही सुझाव ,कितने ही प्लान किए गए थे ,,शान से घर का नाम रखा था."अपना घर" ताकि सभी स्वजनों  को अपना सा फील हो .....

मकान में जब रहने आए ,,तब सबके  चेहरे दमक रहे थे ,,गर्व से मेहमानों को दिखाया भी था,,मेहमानों ने कितनी प्रशंसा भी की थी....12 साल बिताए यहां...इतनी पॉजिटिव वेव्स  महसूस  होती  थींं यहां....यहां आना रहना मतलब बस सुकून....मनकापुर  से यहां आना ही त्योहार सा आभास देता था.....बारह साल से  हर होली  दिवाली  का सहचर रहा है  ये  घर..

          पर अब फिर से इस घर के  मालिक बदल रहे  हैं .....,आज सुबह से ही मन बहुत बोझिल सा था.......कचहरी  के कागजोंं पर आखिरी  दस्तखत करते हुए  ऐसा ही फील हुआ जैसे  कोई  जबरन कुछ छीन रहा हो हमसे......जैसे बेटी की विदाई  की हो आज.....

कुछ वर्षों बाद इसके मालिक बदल गए होगें,,

कोई और रहने आएंगे,फिर कोई और,,घर तब तक शायद बना रहेगा,

किसी की नए मालिक की तलाश में ,,

कहते है ,कोई भी जमीन 100 साल से ज्यादा किसी एक के पास नही रहती,,वह मालिक बदलती है,,।

आप इस भ्रम में मत रहिए कि घर जमीन के आप मालिक है,घर जमीन खुद बदलती है अपने मालिक......

और अब इसने फिर अपना मलिक बदल लिया है......

Monday, March 17, 2025

🙏

कभी कभी लगता है सुख चाहे मिलाये न मिलाये पर  दुःख हमेशा दो लोगों को एक साथ कर देता है....... 
शायद इसलिये ही दूर रहकर भी एक दूसरे का हाथ कसकर पकडे़ रहना चाहिए   कि कहीं कोई एक भी पीछे छूट जाये तो दूसरा उसे खींच कर साथ कर ले....... मन का एक -एक कोना बांट लेना चाहिए .. 
लेकिन अपना मन परत दर परत एक दूसरे के सामने खोल देना बहुत  मुश्किल होता है...
      अब तो बस यही इच्छा  है कि सब खूब खुश रहें हमेशा,
महादेव हमेशा हमारे  साथ खड़े रहें ........

Tuesday, December 31, 2024

पुरानी यादें

जीवन में हम आगे बढ़ते जाते हैं और साथ-साथ कबाड़ भी बढ़ता चला जाता है. इसी  कबाड़ में कभी कुछ ऐसा निकल आता है, कुछ ऐसा मिल जाता है जो हमारी सोई हुई स्मृतियों को जगा देता है......अभी बरसों बाद घर शिफ्ट कर रहे थे तो कबाड़ में न जाने क्या-क्या मिल गया, जाने क्या-क्या याद आता गया


बीता हुआ ज़माना देर तक आँखों के सामने घूमता रहा जब विदेशी सामानों के लिए हमारा एक ही ठिकाना बढनी (नेपाल बॉर्डर) जाना होता था. तब देश विदेशी सामानों का इतना खुला बाजार नहीं बना था. हम जूते से लेकर टूथब्रश और डिजिटल घड़ी वाला पेन तक वहीं जाकर खरीदते थे. तब नेपाल जाने का एक और आकर्षण होता था फैंसी इलेक्ट्रॉनिक सामान, कॉस्मेटिक्स, जैकेट्स और कंबल इत्यादि लेना....... अपने मनकापुर से कार या स्कूटर में बैठकर हम दो घंटे में बढनी पहुँच जाते थे और दिन भर के लिए ‘ग्लोबल’ बन जाते थे, दिन भर घूम घाम कर पिकनिक मना कर शाम को वापस हो लेते थे.

एक दशक तक उन सामानों ने  हमारा बखूबी साथ दिया. खराब तो वे तब भी नहीं हुए थे... जब तक नए नए सामानो ने घर में जगह नही बना लमें.. 

बाद में वे सब बड़े शौक से खरीदे हुए   सामान घर के सामानों में कहीं दब गए.... टांड पर और दीवान में पैक करके धर दिए गए.... . बाद में उसकी जरुरत भी समाप्त हो गई..... बच्चों के लिए वो सब ओल्ड फैशन और आउट आफ डेट हो गए.... 

उन्हें देखती रही और यही सोचती रही कि नई नई तकनीकी उपलब्धियां भी किस तरह एक जमाने में मॉडर्न और बेहद जरूरी समझे जाने वाले उपकरणों को कबाड़ बना देती है.

आज तो फोन तक में आराम से रिकॉर्डिंग की सुविधा है. लेकिन जीवन से जो रोमांच ख़त्म हो गया था  उसकी याद कबाड़ में मिले टेप रिकॉर्डर से हो आई... बच्चों के खिलौने , सुंदर कपड़े ..... डिजाइनर स्टेशनरी... कितनी चीजें... जिनकी अब हमारे जीवन में कोई जगह नही..... सब बांट दिया मैने... 


कई बार लगता है कबाड़ हमारे मर्म को छूने वाली चीजें हैं- सोई हुई स्मृतियों को  जगा देने वाली! न जाने कब का बखिया कब उधड़ने लगता है!

Friday, December 6, 2024

😢😢😢

आज अमित आनंद पांडेय का जन्म दिन है। 
हर वर्ष आज के दिन सुबह सुबह फोन आ जाता।
"दिदिया आज आपके नालायक भाई का जन्मदिन है। आपको तो याद होगा नहीं आशीर्वाद दीजिए"
आज सब कुछ वैसा ही है मुझे जन्मदिन याद भी है। बदला सिर्फ इतना है कि अब तक फोन नहीं आया।
मैं तुम्हारे फोन की प्रतीक्षा में हूं भाई।
(२७-११-२४)

,😢

कुछ  सालो  बाद  
यह  पल  याद  आयेंगे 
जब तुम्हारे आस पास हम न होंगे......
अकेले  जब  भी  होंगे तुम 
हमारे साथ  साथ  गुजारे   हुए  लम्हे  याद  आयेंगे ,
पैसे  तो  बहुत  होंगे  शायद,  
पर  खर्च  करने  के  लिए
 न इच्छा होगी 
न समय
 न ही कोई जरूरत....   
सिर्फ यह अफ़सोस रह जायेगा....
कि काश उन पैसों से ,
तुम फिर वो लम्हे, वो पल  
खरीद सको 
जो  तुमने हमारे बिना गँवा दिए ......
सब कुछ रहेगा पास ...
तुम्हारे ....
सिर्फ    
हम   न होंगे......--------------------------------

Monday, October 14, 2024

😢😢😢

इधर कुछ ड्रेसिंग सेन्स विकसित होता तब तक शरीर का मध्य देश ऐसा बेढब बेडौल विकसित हुआ कि अब नाप के कपड़े मिलना दुश्वार हो चला है.शरीर की चर्बी जलाना सैद्धांतिक रूप से जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है लेकिन कहते हैं कि स्वर्ग का रास्ता सदिच्छाओं से पटा  पड़ा है ऐसे ही तमाम सदिच्छाओं के बावजूद मनुष्य के पेट के रास्ते में ठसाठस चर्बी भरी पड़ी है.

            अब कम न कर पाने की बेबसी में जीना तो मुल्तवी नहीं किया जा सकता लिहाज़ा थोड़ी झेंप से ही अपनी तमाम कमियों के बावजूद  जिए जा रहे हैं l

Saturday, October 12, 2024

बनारस की रामलीला

अपने बचपन में देखी रामलीला  याद आती है...जो बनारस के हर गली मोहल्ले और चौराहों पर होती थी..और सिर्फ राम दरबार और आरती के लिए छोटा सा सोफा नुमा मंच स्थाई रूप से बना हुआ होता था  बाकी रामलीला नुक्कड़ नाटकों की तरह जमीन पर ही खेली जाती थी.....चारों तरफ से जनता /दर्शक घेरे रहती थी....ज्यादा जोशीले बच्चे  सजे धजे राम लक्ष्मण और सीता को लगभग छू लेने की हद तक घेरा तोड कर अंदर पंहुच जाते थे...जिन्हे रामलीला संचालक थोड़ी  थोड़ी  देर पर डंडे से हांक कर पीछे कर देते थे.....
           पेट्रोमेक्स,ढोल, नगाडे़,पिपिहरी,शहनाई वाले भी पूरे जोश में होते थे ..कुछ दृश्य  आज भी ज्यों के त्यों आंखों के सामने हैं....एक तो मोटे शीशों वाला चश्मा और घड़ी  लगाए हुए दशानन.....,एक और दृश्य  में मोटी दफ्ती की बनी लकड़ी  के हैंडल वाली चमकती तलवार जो हर बार मेघनाद के लहराने पर लफलफा के मुड़ जाती थी,और उनके ज्यादा  जोश में आ जाने पर टूट के दो टुकडे़ हो गई  थी,और एक दृश्य जब रावण और राम के युद्ध के समय एक वृद्ध व्यक्ति  जोर जोर से चिल्ला पडे़ थे "मारिए मारिए महराज ...रवणवा को मारिए...काट डालिए ससुरे को"😁😁😁😁 आसपास के सारे लोग हंसते हंसते लोट पोट हो गए  थे,😂😂😂😂

Monday, September 23, 2024

बचपन की,स्कूल  की,कालेज की,उस उम्र की यादें कितनी सीन दर सीन याद रहती हैं....आज भी मेमोरी से डिलीट  नहीं होती...... 


और अब समय यह है कि कई बार लोगों के नाम बहुत याद करने पर भी याद नहीं आते, पांच मिनट पहले रखी चीज़ ढूंढे नहीं मिलती..! लगता है हार्ड डिस्क भर गई है......☹️☹️

Saturday, September 7, 2024

मुश्किल समय😒😒😒

एक बेहद मुश्किल वक्त जो अभी पूरी तरह बीता नहीं है लेकिन बीत जाएगा क्योंकि साथ में बहुत सारे अपनों की दुआएं और प्यार है......इस साल  की शुरुआत  थोड़ी  दिक्कतों से हुई.....

अजीब सी मुश्किल थी और उसके बाद एक के बाद कई दिक्कतें पेश आईं,जिनसे उन्होंने बहुत हिम्मत से मुकाबला किया है वो जो जरा से  बुखार या जुकाम खांसी पर ही  हाथ पैर ढीले कर देते हैं ....कराह कराह कर पूरा घर सर पर उठा लेते हैं. ....पर सब संभल गया और उम्मीद है जल्द सब ठीक हो जाएगा. ....

इस पूरे दौर में अगर कुछ लोग ना होते तो मैं बिखर जाती......

शुक्रिया  तुम बच्चों  ने एक पल भी मेरा हाथ नहीं छोड़ा,जाने कितनी बार मैंने तुम पर अपना दुख उड़ेल दिया,बिना सोचे कि तुम भी परेशान हो सकते हो,तुमने मुझे संभाल लिया,अभी भी वही कर रहे हो।


परिवार और दोस्त जो साथ बने रहे ,उनका भी बहुत शुक्रिया..... सबके नाम यहां लिखना मुश्किल होगा लेकिन आप सब जानते हैं कि मैं दिल से शुक्रगुजार हूं........

इस सब में एक और शख्स का जिक्र किए बिना बात अधूरी रह जायेगी.....

डॉक्टर जेपी सिंह ना सिर्फ बहुत अच्छे डॉक्टर बल्कि  एक बेहतरीन इंसान भी हैं

उनके सामने भी मैं कई कई बार आंसुओं  से रो पडी हूँ. ...पर उन्होंने बहुत ढाढस बंधाया....वैसे भी हर छोटी  बड़ी  बीमारियों में वो संकटमोचक सिद्ध हुए हैं.....कैसी भी तबियत  खराब हो हम सबको वही  याद आते हैं…डेढ महीने कोविड झेला है मैने...मीलों दूर रहते हुए भी उन्होंने साबित किया कि दुनिया में अभी भी अच्छे लोग मौजूद हैं और इसे खूबसूरत बनाए रखने में जुटे हैं...... उन्हें खूब दुआएं कि उनके हिस्से में हमेशा अच्छी सेहत आए और उनके हुनर और नाम में खूब इज़ाफा हो......

Sunday, August 11, 2024

हद्द है

कांग्रेस की दी हुई पेंशन खाकर - खाकर भरे पेट अघाए हुए ये सारे निखट्टू पूरे दिन गांधी, नेहरू को कोसते हैं..... सुबह-सुबह व्हाट्सग्रुपों में 
हिंदूबाजी वाले फ़ॉवर्ड मचाने वाले अंकिल जी...... रेलवे और एअरलाइन्स, आपको सीनियर सिटिजन वाली छूट अब नहीं देंगी..... 😀
          सबसे ज्यादा तो ये बुड्ढों  पर चढ़ा है  हिन्दू होने का ढोंग...... . और ये सठियाए बुढ़ऊ लोग परम् भक्त हैं..... अंकल लोगों की तो उम्र बीत बिता गई लेकिन अभी भी वो स्थिति की गंभीरता को समझने की बजाय ही ही फी फी में मस्त  रहते हैं..... रहना भी चाहिए, आगे जाकर धर्म के नाम पर बने देशों सरीखा हाल होना ही है.. तब बर्बादी से पहले वाला एन्जॉयमेंट लेने में क्या हर्ज है..... पेंशन भी बन्द कर देते तो ये हिंदूबाजी वाले मेसेज भी बन्द हो जाते.... इन्हे जेल में भी बंद कर दें तो भी ये हिन्दू - मुस्लिम वाले मैसेज बंद नहीं होगें।😀