"बाबूजी /माताजी एक्को गिलास पानी तक नहीं मांगे,सेवा का मौका दिए बिना ही चले गए!" यह सुनना कितना अच्छा लगता है न? एक विश्रान्ति का बोध होता है...
अशक्त जीवन,बीमार और तीमारदार दोनों के लिए बोझ बन जाता है...🙏🏻
बुढ़ापा अपने आप में एक रोग है...
वैसे जब हम बहुत बूढ़े होंगे तो क्या स्थिति होगी पता नहीं ......पर वृद्धावस्था समर्पण और विपरीत गति की अवस्था है....... बुढ़ापा आ जाए और मन न मरे ये कष्टदायी स्थिति है.....
सब बच्चों को माता-पिता को बूढ़ा और लाचार देखना दुःख ही देता है .......जो लोग चले गए पर अपने अंतिम समय में बहुत दुःख पाया वैसा किसी के भी साथ ना हो .........सबके बुजुर्ग चलते फिरते चले जायें बस उनके लिए ईश्वर के आगे हाथ ना जोड़ना पड़े कि हे ईश्वर अब इनको मुक्ति दे दे....
बुढ़ापा बहुत दुख देता है ......बड़े से बड़े की हेकड़ी ढीली कर देता है इंसान को औकात दिखा देता है कि देखो यही जीवन का सच है लंबी उम्र मिली तो ऐसे भी झेलना पड़ेगा......समय की ताकत हमें हरा देगी एक दिन .....
बस यही शब्द सत्य है......
एक समय आता है जब हमें अपने ही माता-पिता का अभिभावक बनना पड़ता है...... उनका खाना-पीना,पहनना ओढ़ना,चलना फिरना, मौसम के अनुरूप उनकी देखभाल करना सब कुछ करना पड़ता है.......और यह सावधानी भी बरतनी पड़ती हैं कि कहीं उन्हें यह ना लगे कि हमें उनसे ज्यादा समझ है और उन्हें सही गलत बताने लायक हो गए हैं.....
बहुत तसल्ली होती है अब हमारे बच्चे हमारे अभिभावक बन गए हैं......हमारी इच्छाओं, हमारी जरूरतों , का पूरा ध्यान रखना, बिना कहे ही हर बात समझ जाना , ये सब देखते हुए ये महसूस होता है कि हमने बच्चों के पालन-पोषण और संस्कारों में कोई कमी नहीं रखी.....
जब बच्चों की जिद पर हमने उनके पास आकर रहने की स्वीकृति दी तो सभी ने बहुत खुशी जताई और बहुत भाग्यशाली कहा कि आजकल जहां संतान मां-बाप को साथ रखने को तैयार नहीं वहाँ हमारे बच्चे जिद करके हमें साथ ले आए 😊😊😊