लिखिए अपनी भाषा में

Thursday, February 12, 2026

मैं...

कहीं जाने से पहले सफर के बारे में इतना सोच लेती हूं कि थक जाती हूं... 
कहीं नहीं जाने की आदत...
घर में ही घुसे रहने की आदत...
नये लोगों से परिचय करने के प्रति उदासीनता .......
बाहर न जाने के लिए सौ बहाने बनाती हूँ  मैं ....
इससे तो यही  पता चलता है कि मैं कितने खतरनाक तरीके से घर में बंद रहने के आदी हो चुकी हूँ. ....🙄🙄🙄🙄

Saturday, February 7, 2026

कढ़ी😊😊

इन दिनों दिल्ली एनसीआर में ठंड का आतंक पसरा हुआ है। बाहर बर्फीली हवाएं चल रही हैं और ठंड से लड़ने की जुगत चल रही है। कल  पकौड़ी  वाली कढ़ी बनाऊंगी...... सच कहूं तो मुझे बचपन से ही इसके अलावा कोई और कढ़ी कभी रास नहीं आई। वैसे मैने बहुत तरह की कढ़ियां खाई हैं..... मेरे लिए बेसन और दही के घोल में कुछ भी डाल देना कढ़ी नहीं है। वह तो बस एक समझौता है जिसे मानने के लिए मेरा मन कभी तैयार नहीं होता......
​कढ़ी बनाने का मेरा मिशन शुरू होता है बेसन की जमकर फेंटाई से....यह किसी युद्ध की तैयारी जैसा है....हाथ थकने लगते हैं, लेकिन मैं रुकती नहीं, क्योंकि मुझे पता है कि इसी फेंटाई के भीतर उन मुलायम पकोड़ियों का राज छुपा है जो मुंह में जाते ही घुल जाती हैं.....जब बेसन हवा की तरह हल्का हो जाता है, तब  कढ़ाई में सरसों का तेल धुआं उठने तक गरम करती हूं..... तेल से उठती वह तीखी गंध और उसमें सुनहरी होती बिना प्याज-पालक वाली सादी पकोड़ियां एक जादुई दृश्य रचती हैं.....
​ मेथी दाना, राई, साबुत मिर्च और करी पत्ता जैसे ही गरम तेल में गिरते हैं, एक शोर मचता है। ढेर सारी हींग की खुशबू जब पूरे घर में फैलती है, तो आसपड़ोस वालों को भी खबर हो जाती होगी कि आज कुछ विशेष पक रहा है......
​यह कढ़ी महज एक डिश नहीं, मेरी विरासत है....  मैंने यह हुनर अपनी मम्मी  से विरासत में पाया है... हमारे परिवार में शादी-ब्याह हो, जन्मदिन हो या मुंडन-जनेऊ, कढ़ी के बिना हर शुभ कार्य अधूरा है... यह हमारी सांस्कृतिक और उत्सवधर्मी परंपरा का वह अटूट हिस्सा है जो पीढ़ियों को जोड़ता है....इसे पकाने में धीरज चाहिए,हड़बड़ी नहीं. ...अंत में वह लम्हा आता है जिसका मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता है... मैं एक छोटे बर्तन में शुद्ध देसी घी गरम करती हूं और उसमें लाल कश्मीरी मिर्च डालती हूं। जैसे ही यह तड़का सुनहरी कढ़ी के ऊपर गिरता है, एक गहरा लाल रंग पूरी सतह पर तैरने लगता है। ठंड के इस मौसम में जब इसे भात और आलू की मसालेदार सुनहरी भुजिया के साथ उठाओ बस्ससस ओहहहहहह!!!!!!!यह कढ़ी नहीं, स्वाद और यादों का एक ऐसा रोमांच है जिसे गाहे बगाहे जीना ही चाहिए.....

😊😊😊😊😊😊😊