लिखिए अपनी भाषा में

Tuesday, November 25, 2014

यूँ ही....

यूँ ही.…


 आपके दिमाग में क्या चल रहा है....फेसबुक के  इस  प्रश्न पर सभी अपने  अपने  जी की भड़ास निकालने को आजाद हैं....और उस भड़ास यानि स्टेटस को लाइक्स और कमेंट्स के लिए फेसबुक पर थोप दिया जाता है........ बुरा  तो  तब  लगता  है .....कि  हमारी और कुछ हमारे जैसे ही अदना लोगो की  लिखी  कोई  अच्छी  या  ठीकठाक  सी  बात  पर  भी  लाइक्स और कमेंट्स बहुत  कम  आते  हैं ..और  कई  लोगो  की  ऊल  जुलूल  बातो  पर  भी  अनगिनत  लाइक्स  और  वाद  विवाद  शुरू  हो  जाते  हैं  ...कई  बार  तो  बेहद  मूर्खतापूर्ण  से  स्टेटस  पर  भी ......जैसे किसी महिला ने सिर्फ ये लिख दिया "आह"    बस बन्दे यूं छटपटाने लगेंगे मानों उनका सारा दुःख दर्द दूर कर के ही मानेंगे.....फिर घंटों इसी पर डिस्कसन चलता रहेगा....

Wednesday, October 22, 2014

दीवाली की बचपन की यादें....




      अपने बचपन की दीवाली की यादों में से कुछ बांटने की इच्छा हो रही है..अब लगता है कि कितने भोले भाले पटाखे और आतिशबाजियां चलाई हैं हमने .......आज कल की भयानक आवाजों और दिल दहला देने वाले मंजर के सामने......उस समय में...एक तरह के पटाखे आया करते थे..सफ़ेद रंग के पतंगी कागज़ में थोड़ा सा बारूद वाला मसाला रख कर ऐंठ कर लपेट दिया जाता था....काफी कुछ लहसुन के आकार का ..उसे लहसुनिया पटाखा कहते भी थे..जिसे दीवार पर या जमीन पर इतने जोर से पटका जाता था की वो धड़ाम की आवाज़ के साथ फूट जाता था....एक बड़े पैकेट में काम से काम ५० से १०० लहसुन होते थे.....और उन्हें ज़मीन पर बार बार पटकने से हाथ भर जाते थे....और कई दिनों तक उनमे दर्द बना रहता था..पर फिर भी जोर की आवाज करने के लिए उस समय वो दर्द हम सब भूले रहते थे.......छोटे छोटे सुतली बम...मिर्ची बम....रेलगाड़ी...जो दूर दूर दो कीलों पर पतला सा धागा बाँध कर जला दी जाती थी जो सर्र से उस धागे पर चल कर जाती थी और दूसरें सिरे पर जाकर फिर वापस आती थी.... ..और सबसे मजेदार एक माचिस की डिब्बी जैसी पैकिंग में आने वाली छोटी छोटी लगभग हाजमोला की गोलियों के बराबर आकार जैसी काली काली टिकियां जिन्हे रख कर जलाने पर सरसराता हुआ एक सांप निकलता चला आता था......मुझे याद है उस सांप वाली डिब्बी पर जो चित्र बना होता था..........उसमे पूरा फन काढ कर बैठा हुआ नाग दिखाया जाता था.......पर हम सब कभी उस नाग का फन नहीं देख पाये..........गोल गोल तेजी से घूमने वाली चरखी.......बेहद खूबसूरत चमकदार रंग बिखेरने वाले बड़े बड़े अनार (जो मुझे कभी अनार के आकार के तो नहीं लगे...पता नहीं उनका नाम अनार कैसे पड़ा.? ),,,,..रॉकेट जलाने के लिए कबाड़ी की दूकान से खरीद कर लाई गई बियर की बोतलें.....छोटी छोटी पिस्तौलें ..जिनमे लगाने के लिए पतली पतली पत्तियों..वाली गोलिया.... जो एक बार पिस्तौल में लोड कर लेने पर चट चट की आवाज़ के साथ लगातार चलाई जा सकती थीं....मैंने तो कभी भी पटाखे चलने में रूचि नहीं ली पर मेरा भाई इस कार्य में ..और कहीं न कहीं हाथ पैर जलाने में भी....एक्सपर्ट था...मेरा सबसे मनपसंद दीवाली का आतिशबाजी आयटम था फुलझड़ी .....जो आज भी मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.....
....पटाखे जला लिए जाने के बाद..चारों तरफ फैला हुआ उनका कूड़ा....बटोरना ..और सांप और चरखी जलाने के बाद ........मोजैक के फर्श पर बना हुआ कालिख और जलने का निशान साफ़ करना जो हफ़्तों की मेहनत के बाद कहीं साफ़ हो पाता था..... और अंत में सबसे खास बात..कि इतना कुछ खरीद के लाने के बाद भी १५ से २५ रूपये ही खर्च होते थे.....जब कि आज २५ रूपये में शायद कुछ भी न मिले......